Tuesday, December 2, 2025

हालात की हवा कैसे अनुकूल होती है पढ़िए और समझिए...!

बाज़ के लाईफ स्टाईल से भी बहुत कुछ सीखा जा सकता है....!


लुधियाना
: पहली दिसंबर 2025: (मीडिया लिंक कार्तिका कल्याणी सिंह//मन के रंग डेस्क)::

ज़िंदगी में संतुलन और स्थिरता कायम रहे  तो बहुत ही अच्छा गिना जाता है लेकिन हकीकत यह भी है कि चलती का नाम ही गाड़ी कहा जाता है। थम जाए तो वह बात नहीं रहती। जैसे पानी बहता चले तो स्वच्छ भी लगता है और सुंदर भी। कहा जाता है बहते पानी को बिना किसी जाँच पड़ताल के पी भी लिए जाए तो उसका कोई नुक्सान नहीं होता। ज़िंदगी भी चलती रहे तो इस बहती ज़िंदगी का फायदा खुद को भी होता है और दूसरों को भी। यह एक बहुत पुरानी सच्चाई है। 

वैसे हम सभी को इस सवाल का जवाब खुद के मन से भी टटोलना चाहिए कि हम शरीर, मन और सुंदरता के बीच तालमेल और ऑटो हीलिंग को कैसे बेहतर बना सकते हैं या कब, कहां और कैसे शुरू कर सकते हैं।  मन में आए तो यह भी पूछना बन सकता है कि इसकी शुरुआत किस उम्र में की जा सकती है? इसका दायरा कहां तक बढ़ाया जा सकता है। 

इस बात को समझना भी ज़रूरी होता है कि शरीर, मन और सुंदरता के बीच संबंध को बेहतर बनाने और उसमें तालमेल बिठाने के लिए एक समग्र दृष्टिकोण की ज़रूरत होती है जो शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक स्वास्थ्य और सेल्फ-केयर तरीकों को एक साथ लाता है। आप इस प्रक्रिया को कैसे शुरू कर सकते हैं और कैसे बनाए रख सकते? इस तरह के सभी नुक्तों की भी यहां चर्चा की गई है। 

मन को अपने मुताबिक बनाने या ढालने के लिए सबसे पहले माइंडफुलनेस और मानसिक स्वास्थ्यको भी समझा जाना चाहिए। यह प्रक्रिया दो चार मिंट या एक आध दिन की नहीं होती। यह सतत साधना है। इसे निरंतर जारी रख कर ही लाभ महसूस होगा।  

इस मकसद के लिए मेडिटेशन एक आवश्यक हिस्सा है। रोज़ाना माइंडफुलनेस या मेडिटेशन का अभ्यास शुरू करें। ये तनाव कम करने, फोकस बेहतर बनाने और मन की शांति की भावना को बढ़ावा देने में मदद कर सकते हैं। इसमें कुछ सफलता मिलने जे बाद आप पर बरसने लगेगी मन की शक्तियों की कृपा। 

इसी तरह जर्नलिंग का भी अपना अलग महत्व है। अपने विचारों, भावनाओं और लक्ष्यों पर सोचने के लिए एक जर्नल रखें। यह अभ्यास मन को साफ़ करने और आत्म-जागरूकता को बढ़ावा देने में मदद कर सकता है। इससे विचारों आउट भावनाओं पर पकड़ भी बढ़ जाएगी और अप्प स्वयं को पूरी पारदर्शिता के साथ देख सकेंगे। इसके अभ्यास से आपको दुनिया भी पूरी पारदर्शिता से दिखने लगेगी। 

इसी साधना या अभ्यास के चलते थेरेपी या काउंसलिंग: थेरेपी लेना या किसी काउंसलर से बात करना मानसिक स्पष्टता और भावनात्मक सहारा दे सकता है, जिससे आपको जीवन की चुनौतियों का सामना करने में मदद मिलेगी। जहाँ तजोड़ा सा भी धुंधलापन मेहसूद हुआ तो इससे सहायता मिलेगी उसे पूरी सफाई के साथ देखने में। कोई दीवार या धुंधलापन आपको ढोलहा नहीं दे सकेगा।  

लगातार इसी साधना के चलते मन के साथ साथ शरीर की पहेलियाँ भी आपको समझ आने लगेंगीं। मन कई बार अपने खेल शरीर के ज़रिए ही खेलता है। इस लिए शारीरिक स्वास्थ्य उत्तम रहना भी आवश्यक है। 

शरीरक स्वास्थ्य के लिए संतुलित पोषण का चयन करने और उसे अपना रूटीन बनाने में भी अपने आप सहायता मिलने लगेगी। फलों, सब्जियों, लीन प्रोटीन और साबुत अनाज से भरपूर आहार पर ध्यान दें। सही पोषण आपके शरीर को ऊर्जा देता है और शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य दोनों को सहारा देता है। इस पर कोई संदेह नहीं रहेगा। आपकी दॄष्टि और समझ साफ़ होती जाएगी। 

इस सब कुछ के साथ साथ व्यायाम भी महत्वपूर्ण रहेगा। नियमित शारीरिक गतिविधि, चाहे वह योग हो, चलना हो, स्ट्रेंथ ट्रेनिंग हो या नाचना हो, शरीर को मज़बूत और मन को साफ़ रखती है। खासकर योग, शरीर और मन में तालमेल बिठाने के लिए बहुत अच्छा हो सकता है। धीरे धीरे शरीर अपनी आवश्यकता के मुताबिक आपको मनपसंद योग या साधना भी बताने लगेगा। शरीर को ऐसी साधना में एक नशे जैसा अहसास भी होने लगता है लेकिन यह नशा अक्षम नहीं बनाता बल्कि सक्षम बनाता है। 

जब आप अपने दैनिक रूटीन में यह सब शामिल कर लेते हैं तो पर्याप्त आराम भी बेहद ज़रूरी हो जाता है। इसलिए सुनिश्चित करें कि आपको पर्याप्त अच्छी नींद मिल रही है। आराम शारीरिक रिकवरी और मानसिक स्पष्टता दोनों के लिए बहुत ज़रूरी है। इसके बिना न तो नई ऊर्जा संभव है और न ही शरीर, मन, दिल और दिमाग को तरोताज़ा रख पाना। इस लिए किसी भी हालत में आराम का बलिदान नहीं किया जाए। 

पर्याप्त आराम से ही सुंदरता और सेल्फ-केयर की तरफ आवश्यक ध्यान दिया जा सकेगा। इस से शख्सियत में आकर्षण पैदा होता है और छवि प्रभावशाली बनती है। इससे सिर्फ तन ही नहीं मन की सुंदरता भी बढ़ती है। इसी से बढ़ता है चौतरफा आकर्षण और अंतर्मन की सुंदरता। 

इसी साधना के अंतर्गत आता है स्किन-केयर रूटीन। यह भी बहुत महत्वपूर्ण है। आपकी त्वचा किस तरह की है इसका पता होना ही चाहिए। त्वचा की उस किस्म और प्रकार के अनुसार एक स्किनकेयर रूटीन बनाना भिओ ज़रूरी होगा। लगातार देखभाल त्वचा के स्वास्थ्य को बनाए रखने में मदद करती है, जिससे आप सबसे अच्छा महसूस करते हैं और दिखते हैं।

इस विशेष ध्यान से ही संभव हो पता है समग्र उपचार। मसाज, फेशियल या अरोमाथेरेपी जैसे समग्र सौंदर्य उपचारों को शामिल करने पर विचार करना भी ज़रूति काम हो सकता है।  ये मन को आराम दे सकते हैं और शरीर को फिर से जीवंत कर सकते हैं। उसी से बनता है तन, मन और आत्मा में ऊर्र्जा का एक नया स्रोत। 

माइंडफुल ग्रूमिंग की तरफ भी ध्यान देना आवश्यक है। इसका एक अलग ही महत्व है। अपनी रोज़ाना की ग्रूमिंग रूटीन को एक काम के बजाय आत्म-सम्मान और सेल्फ-केयर के रूप में देखें। दृष्टिकोण में यह बदलाव आपकी समग्र भलाई की भावना को बेहतर बना सकता है। इससे आपके मन की शक्ति बढ़ेगी। आप में एक विराटता आएगी। आपके दिमाग की शक्ति भी विशाल होगी और आत्मिक शक्ति भी। 

इन प्रयासों के चलते ही आपके आध्यात्मिक संबंध विकसित होने लगेंगे। आपको इन दिव्य और दैवी शक्तियों का भी अहसास होगा जिनकी शायद आप ने कभी चर्चा भी न सुनी हो। आपको इन शक्तियों के साथ निकटता का अहसास भी होने लगेगा। आपके रास्तें की कठिनाईआं खुद-ब-खुद आसान बनने लगेंगी। 

योग और प्राणायाम भी इस मार्ग पार आपका सहायक बनेगा। योग और प्राणायाम (सांस पर नियंत्रण) जैसे अभ्यास शरीर की ऊर्जा को संतुलित कर सकते हैं और मानसिक फोकस को बेहतर बना सकते हैं, जिससे शरीर, मन और आत्मा के बीच गहरा संबंध बनता है। योग और प्राणायाम का निरंतर अभ्यास आपको चमत्कारों की सच्ची झलक भी दिखाने लगेगा। अगर आप उन चमत्कारों में गम हुए बिना इसे जारी रख सके तो कमाल के परिणाम निकलेंगे। प्रभु से सामना या मिलाप सहज बनने लगेगा। 

इन सभी प्रयासों और अभ्यासों के चलते प्रकृति और ग्राउंडिंग का भी एक खास महत्व होता है और सचमुच  बहुत है। इसके अंतर्गत प्रकृति में समय बिताएं आपको आनंद के अनुभव होने लगेंगे। घास पर नंगे पैर चलना या बाहर मेडिटेशन करना जैसी ग्राउंडिंग तकनीकों का अभ्यास करें। इसका जादू तुरंत महसूस होगा। प्रकृति का शांत करने वाला एक ऐसा प्रभाव होता है जो आपके सामंजस्य की भावना को भी बढ़ा सकता है।  निरंतरता और धैर्य आपको जीवन में कदम कदम पर काम देंगें। 

यह सब देखने में बेशक आसान लगता हो लेकिन होता कठिन ही है। इसे साधने के लिए रूटीन बनाना बहुत ज़रूरी है। शरीर, मन और सुंदरता के बीच तालमेल बनाए रखने के लिए इन तरीकों को शामिल करते हुए एक रोज़ाना का रूटीन बनाना ज़रूरी है। रूटीन से ही साधा जा सकेगा आत्म संयम /आत्म संयम से ही संभव होगा अनुशासन के पालन। अनुशासन से ही मिलेंगी उपलब्धियां। 

जहां आत्म संयम ज़रूरी होता है वहीं आत्म-करुणा भी बहुत ज़रूरी होती है।अपने आप पर धैर्य रखें। सुधार और ठीक होना धीरे-धीरे होने वाली प्रक्रियाएं हैं। छोटी-छोटी जीतों का जश्न मनाएं और इस रास्ते में अपने प्रति दयालु रहें। कई बार ऐसा भी संभव है जब खुद ही खुद पर करुणा करनी पड़ेगी। 

यह सब करते समय लगातार सीखना मत भूलिए। लगातार सीखना आपके कदमों में बहुत कुछ ला रखेगा। बहुत कुछ मिलता है इस साधना को करने से। लगातार सीखना बहुत कुछ उपलब्ध करवा देता है। अनजान रास्ते जानपहचाने लगने लगते हैं। दुश्मन भी मित्र बनने लगते हैं। सीखने वालों की कदर ज़माना करता है। ऊर्जा और आमदनी के स्रोत उनके लिए खुलते चले जाते हैं। 

शिक्षा उम्र भर आपकी मित्र बन सकती है। जहां से भी शिक्षा मिले ले लेनी चाहिए। वेलनेस, पोषण और सुंदरता में नई प्रथाओं के बारे में जानकारी रखें जो आपके लक्ष्यों के साथ मेल खाती हों। ज्ञान आपको अपनी पूरी सेहत के लिए बेहतर विकल्प चुनने की शक्ति देता है। शिक्षा आपका भी भला करेगी, आपके परिवार और समाज का भी। 

इस साधना के साथ साथ इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि अनुकूलन पर भी आपकी पूरी नज़र रहे। जैसे-जैसे आप बढ़ते हैं, आपकी ज़रूरतें बदल सकती हैं। संतुलन और तालमेल बनाए रखने के लिए अपने रूटीन और तरीकों को बदलने के लिए तैयार रहें। अनुकूल अवसरों पर भी नज़र रखनी होगी। यदि वे अनुकूल नहीं हैं तो उन्हें  अपने अनुकूल बनाने पर भी विचार करना होगा। इन लगातार कोशिशों से ही आपको इस तरह के तरीके पता चल जाएंगे जिनसे प्रतिकूल हालात को अनुकूल बनाना आ जाएगा आपको भी। 

यह तरीका आपके शरीर, मन और सुंदरता को पोषण देने, पूरी सेहत और खुद को ठीक करने को बढ़ावा देने के लिए एक टिकाऊ और एकीकृत सिस्टम बनाता है। फिर एक समय आता है जब आपके हालात खुद-ब-अनुकूल बनते चले जाएंगे। 

कुल मिलकर लोग कहने लगेंगे कि इसकी साधना इतनी ज़्यादा है कि इसे तो देखते ही हवा भी इसके अनुकूल हो जाती है। बाकी इसे करके देखने की ज़िम्मेदारी आपको उठानी ही होगी।

हालात की हवा कैसे अनुकूल होती है पढ़िए समझिए और कोशिश करके देखिए 

Friday, November 7, 2025

मुझे किस तरह से मिली ऐतिहासिक किताब "मां"

अक्टूबर क्रांति अर्थात सात नवंबर को समरण करते हुए विशेष पोस्ट  

साहित्य के रंग भी मन के रंगों को प्रभावित करते रहे 

इसी ने दी ज्ञान की रौशनी और दिखाया रास्ता 


नई दिल्ली की भूमि रहा इसका खोज क्षेत्र: सात नवंबर 2025: (रेक्टर कथूरिया// मन के रंग डेस्क)::

मैक्सिम गोर्की 

मन से जुड़ा गैर-फ़िल्मी साहित्य बहुत बार अपना जादू दिखाता रहा है। गीत और फ़िल्में तो उस की रचना के प्रमाण साबित करने वाली बहुत बाद की बातें हैं। पहले शब्द ही अपना रंग दिखाते रहे हैं। इन्हीं रंगों से तन और मन के रंग प्रभवित भी होते तरहे हैं। आपको याद होगा सोवियत संघ भी और रूस भी। रूर में सन 1905 की  क्रान्ति को रूस की नाकाम क्रान्ति गिना जाता रहा है। अंतिम जीत से पहले इस तरफ की असफलताएं भी अक्सर ज़रूरी बन जाती हैं। 

वास्तव में 1905 की रूसी क्रांति ज़ार के निरंकुश शासन के खिलाफ मजदूरों, किसानों और सैनिकों के व्यापक असंतोष और अशांति का एक बेहद निकर्षजनक दौर था। लोग बेदिल से होने लगे थे। इसी दौर में जो "खूनी रविवार" की घटना के बाद भड़की थी उससे निराशा भी फैली और गुस्सा भी। लेकिन इस नाकाम क्रांति के परिणामस्वरूप भी ज़ार ने सुधारों का वादा ज़रूर किया।  साथ ही एक संसद, ड्यूमा की स्थापना भी कर दी। उसे लगता था शायद लोगों का विद्रोह शांत हो जाए। ऐसा न होना था न ही हुआ। 

इस सब के चलते ज़ार ने निरंकुश शक्ति की अलोकतांत्रिक परंपरा बनाए बनाए रखी। उसने सुधार का दिखावा किया था लेकिन वह सुधरा नहीं था। सियासत पर नज़र रखने वाले गहराई से सब देख रहे थे। उनकी नज़रों ने बहुत कुछ ऐसा भी देखा जो सामने नज़र नहीं आ रहा था लेकिन उसके संकेत स्पष्ट थे। इसीलिए यह क्रांति भविष्य की उथल-पुथल का एक महत्वपूर्ण पूर्वाभ्यास भी मानी जाती है।

सन 1905 की यह क्रांति बेशक नाकाम हो गई थी लेकिन क्रांति के संकल्प में कमी नहीं आई थी। क्रान्ति की ज़ोरदार कोशिशों का सिलसिला जारी था। मुख्य कारण कई थे लेकिन इनमें से आर्थिक और सामाजिक असंतोष मुख्य ही था। श्रमिकों और किसानों के जनजीवन की विकट आर्थिक स्थितियां और कठोर श्रम वातावरण के अंसतोष को बढ़ाने का काम ही कर रहा था। 

इसी बीच रूसी-जापानी युद्ध से भी कई उम्मीदें थी। इस युद्ध में रूस की अपमानजनक हार से उम्मीदें टूट गई थी और नाउम्मीदी बढ़ गई थे लेकिन इन सब से भी जनता के असंतोष को और बढ़ावा मिला। लोगों का जोश कम नहीं हुआ था। 

राजनीतिक दमन भी बढ़ता रहा लेकिन वह जना क्रोश को दबाने में सफल नहीं हो सका। सरकार के विरुद्ध बढ़ता असंतोष एक नै क्रांति के आधार को और मज़बूत बना रहा था। इस बेचैनी के दौर में नागरिक और राजनीतिक स्वतंत्रता की मांग शामिल थी और तेज़ी से उभर रही थी। 

यह वो हालात थे जब 1905 वाली क्रान्ति की कोशिशें नाकाम हो गई थी। उम्मीदें टूट चुकी थी फिर भी कहीं न कहीं राख में कुछ चिंगारियां बाकी थी। इनका सुलगना नज़र नहीं आ रहा था लेकिन अस्तित्त्व तो था। सबसे अधिक काले  दिनों के दौर में भी मैक्सिम गोर्की का दिल और दिमाग उम्मीदों से भरा था हुआ। उसे अपने नावल मां की कहानी बुनते हुए एक साधारण महिला मां के रूप में नायिका बन कर सामने आई। इस नावल ने नायिकत्व की भूमिका निभाई भी। वाम और क्रान्ति की तरफ अनगिनत लोग इस नावल मां को पढ़ कर ही आकर्षित हुए। कहा जा सकता है कि इस पुस्तक ने लोगों को बहुत बड़ी संख्या में आकर्षित किया। 

इस नावल से मेरी भेंट भी बहुत अनूठी थी। एक बहुत लंबी परीक्षा थी मेरे और इस पुस्तक के लगाव की। इस पुस्तक की तलाश काफी समय तक जारी रही। जहां जहां इसके मिलने की संभावना थी वहां तो यह कभी मिली नहीं लेकिन जहां जहां ऐसी कोई उम्मीद नहीं थी वहां यह मिल भी जाती रही। लेकिन बस इतना ही पता चलता की इस दूकान, दफ्तर या फिर लायब्रेरी में यह पुस्तक है। जेब खाली थी इस लिए इसे ख़रीदना मेरे बस में भी न यहीं था। वास्तव पिता जी राजनैतिक कारणों से भूमिगत थे। बहुत से रिश्तेदार भी हमसे दूरी बना चुके थे। पुलिस के आतंक से ऐसा माहौल बनना स्वभाविक ही था। बहुत सी संपतियां क़ानूनी तौर पर हमारी हो कर भी हमारे पास नहीं रही। हर रोज़ अनजानी मुसीबतों का दौर सा था। हाँ इंसान शक से भरा लगता जैसे वह हमारे मामले में आया हो। धीरे धीरे सब ठीक भी होने लगा लेकिन ज़िन्दगी नार्मल होने में बहुत समय लगा। गुरुद्वारा साहिब जाते समय भी बहुत सी आशंकाएं घेरे रखतीं। जहाँ हम रह रहे थे वह मकान किसी धार्मिक परिवार का था। वहां भाई वीर सिंह रचित कलगीधर चमत्कार के दोनों भाग पढ़े। बहुत ऊर्जा मिलती थी उन्हें पढ़ते हुए। 

ऐसे में मैंने जिन पुस्तकों के नाम सुने और इन्हें पढ़ने की इच्छा भी व्यक्त की उन पुस्तकों में मैक्सिम गोर्की की यह महान रचना मां भी थी। कुछ लोगों से बोला भी कि मुझे कोई यह पुस्तक गिफ्ट कर दो लेकिन सभी मुझ पर हंसते और कहते आखिर कामरेड परिवार से ही हो न! चिंता न करो जल्दी पढ़ लोगे। पुस्तक बहुत समय तक नहीं  मिल सकी। 

दौड़ते भागते हम लोग दिल्ली में पहुंच गए क्यूंकि पंजाब के हालत हमारे लिए भी ज़्यादा खराब थे। मेरी उम्र शायद दस या ग्यारह बरस हो चुकी थी। घर में राशन कभी होता और कभी नहीं भी होता। पिता जी का कुछ पता नहीं था कि वह कहाँ है और किस हाल में हैं?। मैं और मां दिल्ली जैसे बड़े महानगर में रहने के बावजूद एक बस्ती के एक छोटे से कमरे में रहते थे। इन सभी तंगियों के बावजूद हम लोगों ने अख़बार पढ़ना नहीं छोड़ा था। वहां अखबार सुबह मुँह अँधेरे ही आ जाया करती थी। 

वक़्त निकलता जा रहा था लेकिन भूख प्यास तो हर रोज़ लगने लगती। इसका सिलसिला रुकता ही नहीं था। इस भूख से भागने के लिए मैंने लायब्रेरी में जाना शुरू किया। हमारे नज़दीक ही रेडियो कॉलोनी हुआ करती था। सड़क के इस तरफ हम थे जिसे कुछ लोग धक्का कॉलोनी कहते और कुछ लोग ढक्का कॉलोनी। सड़क के किनारे थी यह ढक्का कॉलोनी। घर से निकल कर सड़क किनारे पहुँचते तो पीठ पीछे था यह इलाका।  

बायीं तरफ जाने वाली बस या ऑटो पकड़ लो तो किंग्ज़वे कैंप आ जाता। दायीं तरफ चलो तो निरंकारी कॉलोनी जहाँ बस का रुट समाप्त हो जाता था। सड़क को पार कर लो तो रेडियो कॉलोनी और उसके साथ सटी छोटी सी  सड़क वाला रास्ता पकड़ते तो मॉडल टॉऊन आ जाता और उसके बाद कई और रस्ते  भी। 

उस रेडियो कोलोनी के अंदर जा कर ही तकरीबन चार कमरों वाली लायब्रेरी आ जाती थी और गेट में दाखिल हुआ बिना बाहर से निकल जाओ तो साथ सटी सड़क मॉडल टाउन चली जाती।  उसी कॉलोनी में स्थित था सामुदायिक केंद्र और इसी केंद्र में थी सरकारी लाइब्रेरी भी।  तब तक मुझे हिंदी पढ़ना लिखना भी आ गया था। इसलिए वहां मौजूद लायब्रेरी में बैठ  कर मैं वे सभी अखबारें पढ़ता जिन्हें हर रोज़ खरीदना मेरे बस में नहीं था उन दिनों। 

दैनिक नवभारत टाईम्ज़ और दैनिक हिंदुस्तान अख़बारों के साथ साथ धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, दिनमान, कादम्बिनी. जाह्नवी, सरिता मुक्ता, चम्पक और बहुत सी अन्य अखबारें और पत्र पत्रिकाएं इसी लायब्रेर में पढ़ी। लायब्रेरी का स्टाफ सारा दिन देखता... कि यह बच्चा लगातार सारा सारा दिन यहाँ बैठ कर पढता है लेकिन खाता पीता कुछ  भी नहीं।  एक दिन एक मैडम मुझे बाहर परके में बुलाने आई कि चलो सर बुला रहे हैं। मुझे लगा बस अब लाइब्रेरी आना बंद हो जाएगा न जाने कौन सा एतराज़ लगाने की तैयारी में हैं। 

 उन्होंने मुझे चाय पिलाई, साथ में दो मट्ठियां भी। साथ ही कहा यह चाय और मट्ठियां हमारी तरफ से पक्की हो गई। आप हमारे स्टाफ के साथ ही पियोगे हमारी तरफ से।  बस अंदर आ कर बैठा करो। एक मेज़ और कुर्सी भी दे दी गई। एक पेन्सिल, बाल पेन और नोटबुक भी। धीरे धीरे मैं उनके साथ कुछ काम भी करवाने लगा। 

फिर वो कई बार मुझे कुछ पैसे भी देने लगे। वे मुझे किसी होब पर भी ऐडजस्ट करना चाहते थे लेकिन मेरी उम्र बहुत छोटी थी। एक दिन मैंने पुछा क्या मुझे मैक्सिम गोर्की के नावल मां को पढ़ सकता हूँ? क्या यह पुस्तक यहाँ उपलब्ध है? यह सुन कर स्टाफ के इंचार्ज ने मुझे बहुत ध्यान से देखा और वहां अपनी एक सहायक से कहा कि इस किताब को अभई ढून्ढ कर लाओ। सहायक के लिए ज़रा भी मुश्किल नहीं था। वह तुरंत इस पुस्तक को ले आई। इंचार्ज साहिब ने यह पुस्तक मुझे दी और कहा पूरे मनोटोग से पढ़ना इसे पढ़ने में दो दिन लगें या बीस दिन लगें। 

इस तरह मिली मुझे यह ऐतिहासिक किताब "मां"इसे पढ़ने के बाद भी काफी कुछ हुआ। इस संबंध में भी कई दिलचस्प कहानियां हैं। इन की चर्चा जल्द ही किसी अलग पोस्ट में। 


Saturday, September 27, 2025

जब आपका मूड खराब होने लगे तो.....

Research and Got on Tuesday 20th June 2023 at 01:13 PM Regarding Colors of Mind

यहां कुछ प्रेक्टिकल टिप्स हैं जिन्हें आप भी अपना सकते हैं 

चंडीगढ़: 23 सितंबर 2025: (मीडिया लिंक रविंद्र//मन के रंग डेस्क):: AI का सहयोग भी रहा 

Pexels Photo By Mikhail-Nilov
ज़िन्दगी में जब जब भी मूड खराब होता है तो तो सब कुछ गड़बड़ा जाता है। फिर उम्र कुछ भी हो, इलाका कुछ भी हो या शरीर कैसा भी हो। मूड गड़बड़ाए तो कुछ भी करने का मन नहीं रहता। खान पान और घूमना भी नीरस लगने लगता है। ऐसे में ध्यान से देखा जाए तो तन भी मूड की इस खराबी से बुरी तरह प्रभविति होता है। बरसों पहले भी इस तरह की समस्या हुआ करती थी लेकिन मामला गंभीर नहीं हुआ करता था। लोग गली मोहल्ले का चक्कर लगाते तो मूड ठीक हो जाता। घर में चाय कॉफी पीने से भी मूड बदल जाया करता था। शराब जैसी ड्रिंक्स एक तरह से आखिरी हथियार हुआ करती थी। कुछ लोग सिगरेट पी कर भी ठीक हो जाते। बहुत से लोग ठीक भी हो जाते लेकिन कई बार यह सब भी बेअसर रहता। मूड की खराबी कई बार गंभीर हो जाती है। 

ऐसे में बड़े बज़ुर्ग अक्सर सलाह भी देते कि थोड़ा सा विश्राम करें सब ठीक हो जाएगा। वे अक्सर कहते कि अपने मन और शरीर को आराम देने के लिए समय निकालें। नींद से एक जादुई रिलैक्सेशन मिलती भी है। थोड़ी सी झपकी और यूं लगता कि तन मन दोनों की आवश्यक रिपेयर सी हो जाती। शरीर में नयी स्फूर्ति सी आ जाती। इस प्रयास के साथ साथ ही शांति और आत्म-पोषण के लिए मेडिटेशन, योग या दिनचर्या में शामिल होने वाली आरामपूर्ण गतिविधियों का भी आनंद लिया जाता। कुछ मिंट बैडमिंटन का खेल या फिर कोई छोटी सी दौड़ या जॉगिंग से भी मूड सही राह पर आ जाता। कोई अच्छा संगीत भी मन की शक्ति को बढ़ा देता है। नई ऊर्जा मिलती है मूड को भी। 

कई बार किसी मन मिलने वाले अच्छे मित्र, साथी,  दोस्त या परिवार से बातचीत करना भी तुरंत अच्छा परिणाम देता। अपने दिल की बात किसी विश्वसनीय दोस्त या परिवारिक सदस्य के साथ साझा करें। उन्हें आपका मनोवैज्ञानिक स्थिति का तकरीबन हर छोटा बड़ा पहलू पता होता है। उन्हें स्पष्ट हो कर समझाएं और उनका साथ और समर्थन पाएं। नतीजे बहुत अच्छे निकलेंगे। चाहें तो समझकर देख लें। 

साथ हो यह भी ज़रूरी है कि सकारात्मकता के साथ अपने रिश्तों का समीक्षण भी करें।  इससे संबंध और रिश्ते मज़बूत होते हैं। कभी-कभी, मूड खराब होने का कारण हमारे रिश्तों में आपसी संघर्ष, असंतोष या निराशा भी पैदा होने लगती है। इस संदर्भ में, आप अपने रिश्तों को समीक्षा कर सकते हैं और सकारात्मक परिवर्तन के लिए कोई कदम उठा सकते हैं। ऐसी समीक्षा फायदा ही पहुंचाती है। 

मूड को ठीक करने के लिए एक तरीका यह भी है कि अपनी प्रिय गतिविधियों में वक्त ज़रूर बिताएं। जो गतिविधियाँ आपको खुश करती हैं, उनमें खुद को व्यस्त रखें। ऐसाम करने से एक नई ऊर्जा भी मिलती है। उनमें समय बिताएं। यह आपकी मनोदशा को सुधारने और आपको प्रोग्रेसिव और आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करेगी।

इन सब से अलग और विशेष ज़रूरत यह भी है कि पूरी तरह से स्वस्थ रहें। इस तरह हर पहलु से अपने शरीर का ध्यान भी पूरी सतर्कता से रखें। समय पर नींद पूरी करें, स्वस्थ आहार लें और नियमित रूप से व्यायाम करें। यह आपके मूड को सुधारने में मदद कर सकता है। यह आपको नई शक्ति भी झट से दे सकता है। 

इसी दिशा में आखिरी सलाह मेडिकल परीक्षण की भी है। यदि आपका मूड अक्सर ही खराब रहता है और लंबे समय तक बढ़ जाता है, और आपको अपने जीवन में रुचि और आनंद का अहसास नहीं होता है, तो यह बेहतर होगा कि आप किसी मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की सलाह लें। यह स्थिति गंभीर है और मानसिक रोगों की तरफ इशारा करती है। मेडिकल तौर पर अच्छी जानकारी रखने वाले विशेषज्ञ आपको सही मार्गदर्शन और उपचार प्रदान कर सकते हैं। दवाओं के साथ साथ अच्छी एक्सरसाइज़, अच्छा खानपान और लाईफ स्टाईल आपको बहुत सी जादुई शक्ति देने लगता है।     ----------


Sunday, July 6, 2025

मिल जाये मुस्कान कोई; मौत का वरदान कोई!//रेक्टर कथूरिया

ज़िंदगी ने जो कहा था;  मौत ने भी सुन लिया था

पर हमीं वो सुन न पाए; जो मोहब्बत ने कहा था !

इसे  19 जून 2018 की रात्रि को लिखा था। इसके साथ अपना या मन का संबंध अभी तक स्पष्ट नहीं हो पाया। कोशिश जारी है लेकिन न जाने कहां से कोई धुंध सी आ कर रास्ते में रुकी हुई है। सब धुंधला धुंधला सा महसूस हो रहा है। ज़िंदगी ने क्या कहा था? मौत ने तो सुन लिया लेकिन सवाल है कि मैं खुद भी क्यूं नहीं सुन पाया? किस ने रोक रखा था मुझे ?  कौन बना था दीवार ? खैर आप काव्य रचना पढ़िए और बताइए कहां मात खा गई ज़िन्दगी? 

ChatGPT Image 
मिल जाये मुस्कान कोई;

मौत का वरदान कोई। 

देख ले कुछ दर्द मेरे;

काश अब भगवान कोई। 

भरम है भगवान का भी;

यूं ही डर शैतान का भी। 

मन शिवाला बन गया है;

डर  है पर अहसान का भी। 

दिल के अंदर वेदना है;

और ज़रा सी चेतना है। 

खेल भी अब सामने है;

पर किसे अब खेलना है !

आ रहा हर पल बुलावा;

छोड़ दे दुनिया छलावा;

तोड़ भी डाले ये बंधन;

इक तेरी चाह के अलावा ...! 

सोचता हूँ चल पड़ें अब;

उस तरफ भी हैं मेरे सब। 

कोई न लौटा वहां से;

देखते हैं कब मिलें अब !

ज़िंदगी ने जो कहा था;

मौत ने भी सुन लिया था। 

पर हमीं वो सुन न पाए;

जो मोहब्बत ने कहा था। 

                    ---रेक्टर कथूरिया

(19  जून 2018 की रात को करीब 10:55 बजे)