Saturday, November 26, 2022

तनाव मुक्त व सफल जीवन के लिए कार्यशाला आयोजित

Saturday 26th November 2022 at 6:20 PM

बहुत ही यादगारी रही डेराबस्सी में आयोजित हुई कार्यशाला 


एसएएस नगर: 26 नवंबर 2022: (मन के रंग डेस्क):: 

Pexels Photo By Mikhail Nilov 
मन में गड़बड़ी आ जाए तो इसका असर तन पर पड़ता है और तन में गड़बड़ी आ जाए तो इसका असर मन पर पड़ने लगता है। इसलिए दोनों को स्वस्थ रखना अत्यंत आवश्यक है। योग साधना से जहां तन अरोग रहता है वहीं मन भी स्वस्थ रहता है। तन मन दोनों को स्वस्थ रखने की कला सीखने के लिए एक विशेष कार्यशाला का आयोजन किया गया। 

राजकीय महाविद्यालय डेराबस्सी में शनिवार को प्राचार्य कामना गुप्ता के संरक्षण में तनाव मुक्त व सफल जीवन के लिए एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया।  भारतीय योग एवं प्रबंधन संस्थान के सहयोग से आयोजित इस कार्यशाला में योग और ध्यान साधना में निपुण आचार्य साधना संगर ने कॉलेज के छात्रों को योग के सैद्धांतिक और दार्शनिक पहलुओं से परिचित कराया और उन्हें ध्यान और योग मुद्राओं का अभ्यास भी कराया। 

इस संबंध में और अधिक जानकारी देते हुए प्रधानाध्यापिका कामना गुप्ता ने कहा कि योग और ध्यान तन, मन और आत्मा के उन्नयन, अखंडता और स्वस्थ जीवन शैली के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। 

उन्होंने छात्रों को संबोधित करते हुए उन्हें योग को अपनी जीवन शैली का अभिन्न अंग बनाने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने श्रीमती साधना संगर को इस कार्यशाला के लिए धन्यवाद दिया। इस कार्यशाला के दौरान डॉ. सुजाता कौशल, प्रो. अमरजीत कौर, प्रो. अमी भल्ला, प्रो. राजबीर कौर, डॉ. नवदीप कहोल, प्रो. सलोनी, प्रो. नवजोत कौर, डॉ. हरविंदर कौर, प्रो. मनप्रीत कौर, डॉ. गुरप्रीत कौर, प्रो. मनीष आर्य, प्रो. गुरप्रीत कौर, प्रो. रश्मी, प्रो. जयतिका सेबा, श्रीमती सुमन, श्रीमती ज्योति, श्री हरनाम सिंह, श्री जोगिन्दर सिंह व विद्यार्थी उपस्थित थे।

बहुत हीअच्छा हो अगर इस तरह के और आयोजन सभी ज़िलों के सभी गांवों में भी किए जा सकें। 

समाजिक चेतना और जन सरोकारों से जुड़े हुए ब्लॉग मीडिया को मज़बूत करने के लिए आप आप अपनी इच्छा के मुताबिक आर्थिक सहयोग भी करें तांकि इस तरह का जन  मीडिया जारी रह सके।

Tuesday, September 27, 2022

दुनिया की यात्रा करने से पहले देश के पर्यटन स्थल घूम लीजिए

प्रविष्टि तिथि: 27th  September 2022 at 6:35 PM by PIB Delhi

 उपराष्ट्रपति ने राष्ट्रीय पर्यटन पुरस्कार 2018-19 प्रदान किए 


नई दिल्ली: 27 सितंबर 2022: (पीआईबी//इनपुट मन के रंग)::

यह बात बिलकुल एक हकीकत है कि पर्यटन केवल सैर सपाटा नहीं होता। इससे मन के रंग भी प्रभवित होते हैं। बहुत से स्थान हैं जहां जाने मात्र से ही मन की निराशा दूर होती है ,दिल की धड़कनें संतुलित होती हैं और दिमाग में छुपी चिंताएं भी दूर होती हैं। बहाना धार्मिक भी हो सकता है और शिक्षा या रोज़गार भी लेकिन प्रकृति के नज़दीक पहुंच कर निश्चय ही बहुत से लाभ मिलते हैं।  

पर्यटन और दुनिया की चर्चा करते हुए उपराष्ट्रपति श्री जगदीप धनखड़ ने भारत को 'पर्यटन के लिए स्वर्ग' कहा है। उन्होंने भारतीयों से विदेश घूमने से पहले देश के पर्यटन स्थलों को देखने के लिए कहा। भारत के सभ्यतागत इतिहास और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का जिक्र करते हुए उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि देश के अधिकांश पर्यटन स्थलों का हमारे इतिहास, लोक कलाओं और प्राचीन ग्रंथों से गहरा संबंध है। इनके नज़दीक पहुँच कर ही महसूस होता है मन के रंगों में सकारत्मक बदलाव। हमारे तन मन में सुप्त शक्तियों के जागने का अहसास। 

केवल तन मन नहीं अर्थ व्यवस्था भी सुधरती है। पर्यटन से आर्थिकता भी जुडी होती है कारोबार से बहुत से घरों परिवारों की आजीविका भी चलती है। नई दिल्ली स्थित विज्ञान भवन में आज वर्ष 2018-19 के लिए राष्ट्रीय पर्यटन पुरस्कार प्रदान करने के बाद सभा को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने पर्यटन को देश में आर्थिक विकास और रोजगार सृजन का एक प्रमुख वाहक बताया। जिन लोगों को इसी से रोज़गार मिलता है किसी समय हम उनकी सफलता से भरी कहानियां भी आप तक लाएंगे। 

इसके साथ ही आता सेहत और आरोग्य का संसार। पर्यटन के विविध आयामों का जिक्र करते हुए, उपराष्ट्रपति ने चिकित्सा पर्यटन के क्षेत्र में भारत की अपार संभावनाओं के साथ-साथ आयुर्वेद और योग जैसी चिकित्सा की हमारी प्राचीन पद्धतियों में बढ़ती वैश्विक रुचि का पूरी तरह से लाभ उठाने की आवश्यकता पर बल दिया।

इस मकसद के लिए अब तकनीकी विकास भी तेज़ी से हो रहा है। किस क्षेत्र में कब और कैसे जाना चाहिए इसका पता अब घर बैठे इंटरनेट से लगाया जा सकता है। टिकट बुकिंग और आवास बुकिंग जैसी सुविधाएं भी चलने से पहले ही सुनिश्चित हो जाती हैं। देश में पर्यटन क्षेत्र के विकास के लिए सरकार के प्रयासों की सराहना करते हुए, श्री धनखड़ ने कहा कि पर्यटन के बुनियादी ढांचे के विकास के साथ-साथ 'देखो अपना देश' और 'उत्सव पोर्टल' जैसी नवीन पहल की गई है।

उपराष्ट्रपति श्री धनखड़ ने आजादी का अमृत महोत्सव के तहत कई गुमनाम स्वतंत्रता सेनानियों की कहानियों को सामने लाने के लिए पर्यटन और संस्कृति मंत्रालयों की प्रशंसा की। यह एक ऐसा कार्य है जिसकी अहमियत आने वाले समय में और बढ़ेगी। गुमनाम स्वतंत्रता सेनानियों के जीवन ब्योरे संभालना नामुमकिन जैसा था लेकिन इन मंत्रालयों से जुड़े लोगों ने यह सब भी किया है। 

इस क्षेत्र से जुड़े पुरस्कारों की बात भी ज़रूरी है। यात्रा और पर्यटन क्षेत्रों को प्रेरित करने में राष्ट्रीय पर्यटन पुरस्कारों के महत्व की बात करते हुए, उपराष्ट्रपति ने पुरस्कार विजेताओं को उनकी कड़ी मेहनत और उत्कृष्टता के लिए बधाई दी। उन्होंने आज से ‘आजादी का अमृत महोत्सव’ प्रतिष्ठित सप्ताह मनाने के लिए पर्यटन मंत्रालय को भी बधाई दी। इस अवसर पर उपराष्ट्रपति ने 'इंडिया टूरिज्म स्टैटिस्टिक्स 2022' और एक ई-बुक गो बियान्ड: उत्तर भारत के 75 अनुभव जारी किए

इस अवसर पर केंद्रीय पर्यटन और संस्कृति मंत्री श्री जी किशन रेड्डी, पर्यटन और संस्कृति राज्य मंत्री अजय भट्ट, पर्यटन मंत्रालय के सचिव श्री अरविंद सिंह, मंत्रालय में अपर सचिव श्री राकेश कुमार वर्मा, पर्यटन मंत्रालय के महानिदेशक श्री जी. कमला वर्धन राव समेत अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।

पूरा भाषण निम्नलिखित है:

'विश्व पर्यटन दिवस की बधाई!

वर्ष 2018-19 के लिए राष्ट्रीय पर्यटन पुरस्कारों के अवसर पर आप सभी के बीच यहां उपस्थित होना सौभाग्य की बात है। यह उद्योग हितधारकों के प्रयासों को मान्यता देने और उनका सम्मान करने का अवसर है।

आज से ‘आजादी का अमृत महोत्सव’ प्रतिष्ठित सप्ताह मनाने के लिए पर्यटन मंत्रालय को बधाई।

आजादी का अमृत महोत्सव प्रेरक और उत्साहवर्धक माहौल तैयार कर रहा है। इन प्रयासों ने हमारी संस्कृति से प्रामाणिक रूप से जुड़ने के लिए दुर्लभ और बेहद जरूरी अवसर प्रदान किया है।

राष्ट्रीय पर्यटन पुरस्कार समय के साथ यात्रा, पर्यटन और आतिथ्य क्षेत्रों में उपलब्धियों की प्रतिष्ठित मान्यता के रूप में उभरा है। ये पुरस्कार इन क्षेत्रों को बढ़ावा देने का एक महत्वपूर्ण माध्यम हैं।

यात्रा और पर्यटन दुनिया के सबसे बड़े आर्थिक क्षेत्रों में से एक हैं, जो दुनियाभर में निर्यात और समृद्धि बढ़ाते हैं। भारत वास्तव में पर्यटन के लिए स्वर्ग है।

भारत की समृद्ध सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत को देखिए, (जिसमें देशभर में फैली विविध पारिस्थितिकी, भूभाग और प्राकृतिक सुंदरता शामिल है) पर्यटन में आर्थिक विकास और रोजगार के चालक के रूप में अद्भुत सामर्थ्य है।

हमारे आसपास की नई चीजों का पता लगाने, देखने और अनुभव करने की इच्छा एक सहज मानवीय गुण है। भारत एक प्राकृतिक गंतव्य है, जिसे प्रकृति ने भरपूर उपहार सौंपे हैं।

हममें से जो लोग दुनिया में घूमने के लिए जाते हैं, उन्हें पहले अपने देश के पर्यटन स्थलों को देखने की जरूरत है।

हिमालय की बर्फ से ढकी चोटियों से लेकर ओडिशा के रेतीले समुद्र तटों तक, राजस्थान के रेगिस्तान से लेकर सुंदरबन के डेल्टा क्षेत्रों तक, असम के चाय बागानों से लेकर केरल के बैकवाटर तक, ये सब रोमांचक और शानदार हैं।

भारत शायद अकेला ऐसा देश है, जहां एक ही यात्रा में कई जरूरतें पूरी की जा सकती हैं।

हमारे सभ्यागत इतिहास और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के चलते अधिकांश पर्यटन स्थलों का पौराणिक अतीत, लोक नृत्य रूपों और प्रांचीन ग्रंथों से गहरा नाता है।

मध्य प्रदेश के कुनो राष्ट्रीय उद्यान में अब चीता, रणथंभोर में बाघ और गिर के जंगलों में शेर देखे जा सकते हैं।

देश में पर्यटन के क्षेत्र के विकास के लिए सरकार 360 डिग्री का दृष्टिकोण अपना रही है।

पर्यटन के लिए बुनियादी ढांचे के व्यापक और अभिनव विकास के साथ-साथ रेल, सड़क और हवाई संपर्क को बढ़ाने पर विशेष ध्यान दिया गया है जिससे देश के सभी कोनों से पर्यटन स्थलों पर पहुंचना आसान हो।

देश की विविध संस्कृति, विरासत, स्थलों और पर्यटन उत्पादों को प्रदर्शित करने में मंत्रालय की शानदार पहल 'देखो अपना देश' सफल रही है।

पर्यटन क्षेत्र में रोजगार सृजन सरकार के प्रमुख एजेंडे में से एक है।

दि इनक्रेडिबल इंडिया टूरिस्ट फैसिलिटेटर (आईआईटीएफ)- सर्टिफिकेशन कार्यक्रम और देशभर में कार्यक्रमों, त्योहारों और लाइव दर्शन दिखाने के लिए मंत्रालय द्वारा शुरू की गई डिजिटल पहल ‘उत्सव पोर्टल’ शानदार है।

इंटरनेट कनेक्टिविटी और सोशल मीडिया के इस दौर में, वर्चुअल स्पेस भी पर्यटकों को बेहतरीन अनुभव प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

भारत में चिकित्सा पर्यटन के क्षेत्र में जबर्दस्त संभावनाएं हैं और हमें समग्र स्वास्थ्य की तलाश में आने वाले अधिक से अधिक पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए आयुर्वेद और योग जैसी चिकित्सा की हमारी प्राचीन पद्धतियों का पूरी तरह से लाभ उठाने की जरूरत है। इसमें पहले से ही लोग काफी दिलचस्पी ले रहे हैं।

पर्यटन उद्योग में सभी हितधारकों के लिए यह उचित होगा कि वे पारिस्थितिक रूप से जिम्मेदार और स्थायी पर्यटन प्रथाओं का पालन करें।

पर्यटकों को भी अपनी ओर से 'स्वच्छ भारत अभियान' को ध्यान में रखना चाहिए और ऐतिहासिक स्मारकों पर लिखने या उसे विकृत करने से बचना चाहिए।

पुरस्कार विजेताओं और इस तरह के प्रतिष्ठित आयोजन के लिए पर्यटन मंत्रालय को बधाई।'

********** 

समाजिक चेतना और जन सरोकारों से जुड़े हुए ब्लॉग मीडिया को मज़बूत करने के लिए आप आप अपनी इच्छा के मुताबिक आर्थिक सहयोग भी करें तांकि इस तरह का जन  मीडिया जारी रह सके।

Friday, August 26, 2022

पत्रकार सतीश कत्याल ढूंढ कर लाए ज़िंदगी की मार्मिक कहानी

Friday 26th August 2022 at 07:14 PM 

 सब कुछ एक रोचक कहानी के रूप में 

संकेतक फोटो Pexels-Photo by Cottonbro

लुधियाना
: 26 अगस्त 2022: (मन के रंग डेस्क):: 

जानीमानी शख्सियत राकेश भारती मित्तल के साथ
पत्रकार सतीश कत्याल
 
पत्रकार सतीश कत्याल से मुझे हमेशां एक शिकायत रही कि आपको पत्रकार नहीं लेखक या शायर होना चाहिए था। आप हर बात को दिल पर ले लेते हैं इस तरह पत्रकारिता थोड़े होगी? जबकि मेरा अपना स्वभाव भी इसी तरह का था। मुझे खुद भी लगता अच्छाई भली शायरी और कहानी छोड़ कर इस तरफ क्यूं आ गया? शायद यही होती है किस्मत। यही होती है कर्मों के फल की कहानी। हम लोगों ने ओंड़गी के बहुत से साल खबरों की दुनिया के नाम कर दिए। रात रात भर कभी सिविल अस्पताल, कभी थाने और कभी घटनास्थल। आधी रात के बाद  घर पहुंचना। डिनर कर लिए तो कर लिए नहीं किया तो नहीं भी किया। बस आते सार खबर लिखनी, फैक्स करनी तब कहीं चाय पानी की बात सोचना और फिर अपने अपने घर सो जाना। अब फिर दोनों की संतान पत्रकारिता में है। बहुत कुछ यद् आता है तो आज भी सारा ध्यान अतीत में चला जाता है। आज सतीश कत्याल साहिब ने एक पोस्ट भेजी.शीर्षक है एक रोचक कहानी।  पता नहीं पहले कहीं  छपी भी हो। इसका मूल लेखक कौन है यह भी नहीं मालुम लेकिन इसे जितना पढ़ा जाए उतना ही कम है। हमारी ज़िंदगी की बहुत अहम बात बताती है यह कहानी। 

कहानी है स्कूल के चार करीबी दोस्तों की आंखें नम करने वाली कहानी है। जिन्होंने एक ही स्कूल में कक्षा बारवीं तक पढ़ाई की है। हम भी शायद चार या ज़्यादा थे। दिन रात एक साथ रहने वाले मित्रों की मंडली। याद करें तो बहुत सी बातें याद आती हैं। मैं चाय बहुत पीत था और कत्याल साहिब सिगरेट बहुत पीते थे लेकिन अब तो हाथ भी नहीं लगाते। उस समय शहर में इकलौता लग्ज़री होटल भी था। खान पान के मामले में उस समय का केंद्रीय स्थान कहा जा सकता है। 

अब लौटते हैं चार मित्रों की बात पर। कक्षा बारवीं की परीक्षा के बाद इन चारो मित्रों ने तय किया कि हमें उस होटल में जाकर चाय-नाश्ता करना चाहिए। हर साधारण इंसान के बस में नहीं था वहां जाना। महंगा भी तो था। उन चारों ने मुश्किल से चालीस रुपये जमा किए, रविवार का दिन था, और साढ़े दस बजे वे चारों अपने अपने साईकल से उस होटल में पहुंचे। 

चारो मित्र सीताराम, जयराम, रामचन्द्र और रविशरण चाय-नाश्ता करते हुए बातें करने लगे। ज़िंदगी का एक अहम पड़ाव पूरा हो ग़ज़ा था। नया अध्याय शुरू होने को थे। नै मंज़िलें और नए रास्ते सामने आने वाले थे। उन चारों ने सर्वसम्मति से फैसला किया कि 40 साल बाद हम पहली अप्रैल को इस होटल में फिर मिलेंगे। उस समय के वायदे और संकल्प इत्यादि इसी ढंग तरीके के हुआ करते थे। चालीस साल बाद मिलने का वायदा हुआ। सोचने लगे तब तक हम सब को बहुत मेहनत करनी चाहिए, यह देखना दिलचस्प होगा कि किसकी कितनी प्रगति होती है। कौन इस सफर  पहुंचता है। किस्मत किस पर मेहरबान होती है और लक्ष्मी किस पर कृपा करती है। चालीस साल बाद मिलने का वायड हुआ तो साथ ही यह भी तय हुआ कि जो दोस्त उस दिन बाद में होटल आएगा उसे उस समय का होटल का बिल देना होगा। उनदिनों  भी लेट आने का सही जुरमाना कुछ इसी तरह का ही हुआ करता था। 

उनको चाय नाश्ता परोसने वाला वेटर कालू भी यह सब सुन रहा था, उसने कहा कि अगर मैं यहाँ रहा, तो मैं इस होटल में आप सब का इंतज़ार करूँगा। इस तरह वह भी इस मित्रमंडली में शामिल भी हुआ और गवाह भी रहा। संखजा अब चार से पांच हो गई थी। इस तरह इस मुलाकात के बाद आगे की शिक्षा के लिए चारों मित्र गले किले और अलग- अलग हो गए।

सीताराम शहर छोड़कर आगे की पढ़ाई के लिए अपने फूफ़ा के पास चला गया था, जयराम आगे की पढ़ाई के लिए अपने चाचा के पास चला गया, रामचन्द्र और रविशरण को शहर के अलग-अलग कॉलेजों में दाखिला मिला। चारों के रास्ते अलग हो गए थे। चारों को मंज़िलों की तलाश थी। अजीब बात कि आम तौर पर हर दौर में में जीवन की सफलता ही बहुत से लोगों की मंज़िल रही। फिर उनके बच्चों की--फिर उनके बच्चों की। जीवन की अंतर्यात्रा पर तो गौतम बुद्ध और ओशो जैसे  बहुत काम लोग ही निकल सके। अंतर्यात्रा पर निकलने वालों को आम तौर पर दुनिया असफल इंसान समझ लेती है क्यूंकि पैसा उनकी मंज़िल ही नहीं रहता। पद और शोहरत को वे लोग समझते ही।  पर सफलता का पैमाना वही सफलता है जिस की तलाश इन चारो मित्रों को भी थी।  

आखिरकार रामचन्द्र भी शहर छोड़कर चला गया। दिन, महीने, साल बीत गए। वक्त पंख लगा कर उड़ता चला गया। इलाकों, इमारतों और रास्तों के रंग रूप ही बदल गए। इन 40 वर्षों में उस शहर में आमूल-चूल परिवर्तन आया, शहर की आबादी बढ़ी, सड़कों, फ्लाईओवर ने महानगरों की सूरत बदल दी। शहर की पहचान ही कहां  आती थी। शहर की वो चालीस साल पहले वाली सादगी अब लुप्त हो चुकी थी। जिस होटल प् मिलना था अब वह होटल भी स्टार होटल बन गया था, वेटर कालू अब कालू सेठ बन गया और साथ ही इस होटल का मालिक भी बन गया था।

एक लम्बा अरसा गुज़र चूका था। चार दश्क अर्थात 40 साल बाद, निर्धारित तिथि, पहली अप्रैल भी आ गई। दोपहर में, एक लग्जरी कार होटल के दरवाजे पर आई। सीताराम कार से उतरा और पोर्च की ओर चलने लगा, सीताराम के पास अब तीन ज्वैलरी शो रूम हो चुके थे। उसने बहुत पैसा कमा लिया था। 

सीताराम होटल के मालिक कालू सेठ के पासपहुंचा, दोनों एक दूसरे को देखते रहे। भीगी आंखों में ख़ुशी भी थी। कालू सेठ ने कहा कि रविशरण सर ने आपके लिए एक महीने पहले एक टेबल बुक किया था। सो आप आइए। आपका स्वागत है। 

सीताराम मन ही मन खुश था कि वह चारों में से पहला था, इसलिए उसे आज का बिल नहीं देना पड़ेगा, और वह सबसे पहले आने के लिए अपने दोस्तों का मज़ाक उड़ाएगा।

एक घंटे में जयराम भी आ गया, जयराम भी तरक्की कर के शहर का बड़ा राजनेता व बिजनेस मैन बन गया था। उसका छ ख़ासा नाम था पूरे इलाके में। उसकी तूती बोलती थी। 

अब दोनों बातें कर रहे थे और दूसरे मित्रों का इंतज़ार कर रहे थे, तीसरा मित्र रामचन्द्र आधे घंटे में आ गया।

उससे बात करने पर दोनों को पता चला कि रामचन्द्र भी अब बहुत बड़ा बिज़नेसमैन बन गया है।

तीनों मित्रों की आंखें  बार-बार दरवाजे पर जा रही थीं, रविशरण कब आएगा ?

इतनी देर में कालू सेठ ने कहा कि रविशरण सर की ओर से एक मैसेज आया है, तुम लोग चाय-नाश्ता शुरू करो, मैं आ रहा हूँ।

तीनों 40 साल बाद एक-दूसरे से मिलकर खुश थे।

घंटों तक मजाक चलता रहा, लेकिन रविशरण नहीं आया।

कालू सेठ ने कहा कि फिर से रविशरण सर का मैसेज आया है, आप तीनों अपना मनपसंद मेन्यू चुनकर खाना शुरू करें।

खाना खा लिया तो भी रविशरण नहीं दिखा, बिल मांगते ही तीनों को जवाब मिला कि ऑनलाइन सिस्टम से बिल का भुगतान भी हो गया है।

शाम के आठ बजे एक युवक कार से उतरा और भारी मन से निकलने की तैयारी कर रहे तीनों मित्रों के पास पहुंचा, तीनों उस आदमी को देखते ही रह गए।

युवक कहने लगा, मैं आपके दोस्त का बेटा यशवर्धन हूँ, मेरे पिता का नाम रविशरण  है।

पिताजी ने मुझे आज आपके आने के बारे में बताया था, उन्हें इस दिन का इंतजार था, लेकिन पिछले महीने एक गंभीर बीमारी के कारण उनका निधन हो गया।

उन्होंने मुझे देर से मिलने के लिए कहा था, अगर मैं जल्दी निकल गया, तो वे दुखी होंगे, क्योंकि मेरे दोस्त तब नहीं हँसेंगे, जब उन्हें पता चलेगा कि मैं इस दुनिया में नहीं हूँ, तो वे एक-दूसरे से मिलने की खुशी खो देंगे।

इसलिए उन्होंने मुझे देर से जाने का आदेश दिया था।

उन्होंने मुझे उनकी ओर से आपको गले लगाने के लिए भी कहा था, यशवर्धन ने अपने दोनों हाथ फैला दिए।

आसपास के लोग उत्सुकता से इस दृश्य को देख रहे थे, उन्हें लगा कि उन्होंने इस युवक को कहीं देखा है।

यशवर्धन ने कहा कि मेरे पिता शिक्षक बने, और मुझे पढ़ाकर कलेक्टर बनाया, आज मैं इस शहर का कलेक्टर हूँ।

सब चकित थे, कालू सेठ ने कहा कि अब 40 साल बाद नहीं, बल्कि हर 40 दिन में हम अपने होटल में बार-बार मिलेंगे, और हर बार मेरी तरफ से एक भव्य पार्टी होगी।

अपने दोस्त-मित्रों व सगे-सम्बन्धियों से मिलते रहो, अपनों से मिलने के लिए बरसों का इंतज़ार मत करो, जाने कब किसकी बिछड़ने की बारी आ जाए और हमें पता ही न चले।

शायद यही हाल हमारा भी है। हम अपने कुछ दोस्तों को सलाम दुआ मुबारक बाद आदि का मैसेज भेज कर ज़िंदा रहने का प्रमाण देते हैं।

ज़िंदगी भी ट्रेन की तरह है जिसका जब स्टेशन आयेगा, उतर जायेगा। रह जाती हैं सिर्फ धुंधली सी यादें।

परिवार के साथ रहें, ज़िन्दा होने की खुशी महसूस करें..

सिर्फ ईद दीपावली के दिन ही नहीं अन्य सभी अवसरों तथा दिन प्रतिदिन मिलने पर भी गले लगाया करें।  

मित्र सतीश कत्याल की तरफ से भेजी गई यह कहाँ केवल उन चार मित्रों की नहीं हमारी भी है। हम एक ही शहर में रहते हुए भी कहां मिल पाते हैं एक दुसरे से। ऐसी तरक्की और ऐसी कमाई भी किस काम की जो अपनों से ही दूर कर दे। क्या सचमुच महंगाई और अन्य झमेलों ने हमें एक दुसरे से मिलने में  रुकावटें खड़ी कर दी हैं? आइए धर्म, जाती, पार्टी और सियासत को एक तरफ रखते हुए एक दुसरे से मिले करें जैसे शुर शुर में मिला करते थे। -रेक्टर कथूरिया 

Thursday, June 30, 2022

’हौसलों के पंख’ से भी उड़ सकता है इंसान,

30th June 2022 at 05:29 PM

100 प्रतिशत अंक अर्जित कर रवि मीना ने कर दिखाया कमाल 


ज़िला दौसा
//जयपुर: 30 जून 2022: (मन के रंग//राजस्थान स्क्रीन)::

आज का ज़िला दौसा कभी जयपुर का ही हिस्सा हुआ करता था। इसलिए बहुत से लोग इसे आज भी जयपुर ही समझते हैं। दौसा क्षेत्र में कछवाहा राज्य के संस्थापक दूल्हेराय ने लगभग 1137 ईस्वी में बड़गूजरों को हराकर अपना शासन स्थापित किया था। इसे ज़हन के इतिहास में विशेष स्थान हासिल रहा है। इसे ढूंढाड़ अंचल के कछवाहा वंश की प्रथम राजधानी भी बनाया गया था। इसकी भी कई बातें प्रचलित रही हैं। दौसा जिले को जयपुर से पृथक कर 10 अप्रैल 1991 को नया जिला बनाया गया। प्रारंभ में दौसा जिला राजस्थान का क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे छोटा जिला (क्षेत्रफल 2950 वर्ग किलोमीटर) था, लेकिन सवाईमाधोपुर की महुआ तहसील को 15 अगस्त 1992 को दौसा जिले में सम्मिलित किया गया जिससे इसका क्षेत्रफल बढ़कर 3432 वर्ग किलोमीटर हो गया और यह धौलपुर के बाद दूसरे नंबर का सबसे छोटा जिला बन गया। दौसा नगर देवगिरी पहाड़ी की तलहटी में बसा हुआ है तथा यह राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 11 पर स्थित है। तब से ले कर आज तक दौसा अपने बडप्प्पन के मील पत्थर गाड़ता ही चला आ रहा है। इसी दौसा से सबंधित हैं रवि जिसने साबित किया पंख होने से कुछ नहीं होता हौंसलों से उड़ान होती है। 

प्रदेश में 12 वीं के घोषित परिणाम में दिव्यांग बालको के उच्च माध्यमिक बोर्ड परीक्षा 2022 के परिणाम में दौसा जिले के एक दिव्यांग विद्यार्थी ने ’100 प्रतिशत’अंक लाकर साबित कर दिया कि दौड़ने के लिए पैरो की जरूरत नही होती, ’हौसलों के पंख’से भी इंसान उड़ सकता है।
 
बचपन से दोनों पैरों से दिव्यांग रवि ने घोषित दिव्यांग बालकों के माध्यमिक बोर्ड परीक्षा 2022 के रिजल्ट में 100ः अंक प्राप्त कर साबित कर दिया कि दौड़ने के लिए पैरों की नहीं बल्कि मजबूत हौसले की आवश्यकता होती हैं । हौसले के पंख से भी इंसान सफलता रूपी उड़ान भर सकता है। यदि दिल में कुछ करने की तम्मन्ना हो तथा हौसले बुलंद हैं तो कोई भी समस्या आपको रोक नहीं सकती है। ऎसा ही कर दिखाया रवि कुमार मीणा ने। 80 प्रतिशत दिव्यांग बालक ने घोषित दिव्यांग बालको के उच्च माध्यमिक बोर्ड परीक्षा 2022 के परिणाम में ’100 प्रतिशत’ अंक लाकर साबित कर दिया कि दौड़ने के लिए पैरो की जरूरत नही होती। ’हौसलों के पंख’ से भी इंसाल उड़ सकता है। छात्र रवि कुमार मीणा पुत्र श्री फैलीराम मीणा, राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय गन्डरावा दौसा को होम बेस्ड शिक्षा से सत्र 2009-10 में जोड़ा गया था। छात्र पैरो से चलने में पूरी तरह असमर्थ है।

लेकिन कहते है न कि हिम्मते मर्दा मददे खुदा, एकबार राह दिखाने के बाद रवि कुमार ने पीछे मुड़कर नही देखा और 12 वीं के घोषित परीक्षा परिणाम में छात्र ने राजस्थान में सर्वाधिक अंक प्राप्त करने वालो में शुमार है। कक्षा 10 में 86 प्रतिशत अंको के बाद इस वर्ष कक्षा 12 में 100 प्रतिशत अंक अर्जित कर कीर्तिमान स्थापित कर दिया है। माध्यमिक बोर्ड परीक्षा 2022 में निजी विद्यलय के छात्र गिरीश शर्मा के सर्वोच्च अंक प्राप्त करने के बाद ’दौसा के गौरव में रवि मीणा’ ने चार चांद लगा दिये है।

समसा द्वारा छात्र को समय समय पर प्रोत्साहित किया गया एवं ट्रायसाइकिल, परिवहन भत्ता और एस्कार्ट भत्ता भी प्रदान किया गया। छात्र के पिता कृषि व मां गृहणी का कार्य करते है। ग्रामवासियों, विद्यालय के स्टाफ एवं आमजन ने छात्र रवि कुमार के उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हुए बधाई दी। जिला शिक्षा कार्यालय की ओर से छात्र रवि उसके माता-पिता, विद्यालय के प्रधानाचार्य सहित समस्त स्टाफ को बहुत बहुत बधाई दी गई।

विशेष योग्यजन आयोग के राज्य आयुक्त उमाशंकर शर्मा स्वंय दौसा जिले के सिकराय उपखंड के ग्राम पंचायत गंडरावा पहुंचकर रवि कुमार मीना को बधाई दी एवं माला पहनाकर हौसला अफजाई की। राज्य आयुक्त ने रवि की हौसला अफजाई करते हुए आगे बढ़ने के लिए निरंतर प्रयासरत रहने की बात कही तथा रवि के माता-पिता को बधाई दी इस अवसर पर ग्राम पंचायत गंडरावा के गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।

------ 

- रामजी लाल मीना
सहायक निदेशक, दौसा

Tuesday, February 22, 2022

तन, मन और वनस्पति के साथ समन्वय के रंगों पर विशेष

22nd February 2022 at 05:23 PM

 औषधीय पौधों के रूप में मिला जीवनदान 


जयपुर
: 22 फरवरी 2022: (मन के रंग//राजस्थान स्क्रीन)::

Pexels-Photo By Ennie Horvathy
राज्य के औषधीय पौधे गुणवत्ता एवं विविधता के लिए विश्व प्रसिद्ध हैं। कोरोना काल के दौर में इन औषधीय पौधो की महत्ता और बढ़ी है। राज्य सरकार द्वारा इसी महत्ता को समझते हुए आमजन की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने के लिए ‘घर घर औषधि योजना की शरुआत की गई। इस योजना के माध्यम से तुलसी, गिलोय, अश्वगंधा तथा कालमेघ के पौधे आमजन को वितरित किए गए।

जन स्वास्थ्य में बेहतर सुधार के लिए सरकार द्वारा औषधीय पौधों के रूप में घर-घर तक सेहत की ‘संजीवनी’ पहुंचाई गई। पूरे प्रदेश में संचालित हो रही घर-घर औषधि योजना के तहत विभाग द्वारा पहले वर्ष के पौध वितरण का लक्ष्य शत-प्रतिशत पूर्ण कर लिया गया है। इसके साथ ही सभी जिलों में आगामी वर्ष के लिए तैयारियां जारी हैं। सम्पूर्ण वन विभाग के प्रयासों की बदौलत ही प्रदेश भर में औषधीय पौधों की 63 लाख से अधिक किट्स का वितरण किया जा चुका है।

प्रदेश के आधे परिवारों तक योजना में देय चारों प्रजातियों के औषधीय पौधे पहुंचाए गए हैं। संपूर्ण वन विभाग और राज्य के सभी विभागों के प्रयासों की बदौलत पहले वर्ष का पौध वितरण लक्ष्य पूर्ण हो गया है। पहले वर्ष प्रदेश के आधे परिवारों तक तुलसी, गिलोय, अश्वगंधा और कालमेघ के 2-2 सहित कुल 8 औषधीय पौधे पहुंचाए गए हैं। दूसरे वर्ष में प्रदेश के आधे परिवारों तक औषधीय पौधे पहुंचाए जाएंगे। पांच वर्षीय इस योजना के तीसरे साल में सभी परिवारों तक और उसके बाद के 2 वर्षों में आधे-आधे परिवारों तक औषधीय पौधे पहुंचाए जाएंगे। इस तरह से 5 वर्षों में सभी परिवारों को तीन बार 4 प्रजातियों तुलसी, अश्वगंधा, कालमेघ और गिलोय के कुल 24 औषधीय पौधे दिए जाएंगे।

210 करोड रूपए की लागत वाली यह योजना अपनी तरह की देशभर में अनूठी योजना है। मुख्य सचिव की अध्यक्षता में गठित राज्य स्तरीय प्रबोधन समिति द्वारा योजना के सफल क्रियान्वयन के लिये निरंतर बैठकें लेकर अधिकारियों से गंभीर विचार-विमर्श किया गया। इसी तरह योजना के बारे में जन-जन तक जानकारी पहुंचाने और आमजन को औषधीय पौधों के संरक्षण तथा उपयोग के प्रति जागरूक करने के लिए आईईसी कमेटी के प्रयास भी सराहनीय रहे।

योजना के माध्यम से राज्य में औषधीय पौधों को उगाने के इच्छुक परिवारों को स्वास्थ्य रक्षण हेतु बहु-उपयोगी औषधीय पौध वन विभाग की पौधाशालाओं से उपलब्ध करवाए गए। साथ ही लोगो की प्रतिरक्षण (इम्युनिटी) क्षमता बढ़ाने तथा चिकित्सा हेतु बहु-उपयोगी औषधीय पौधों की उपयोगिता के बारे में व्यापक प्रचार-प्रसार किया गया। जिला प्रशासन व वन विभाग के नेतृत्व में, जन-प्रतिनिधि लोगो, पंचायत संस्थाओं, विभिन्न सरकारी विभागों व संस्थानों, विद्यालयों, और उद्योग इत्यादि का सहयोग लेकर जन- अभियान के रूप में योजना का क्रियान्वयन किया गया।

वन विभाग की पौधशालाओं में पौधे तैयार करने के बाद जिला स्तरीय टास्क फोर्स के सहयोग से पौधे आमजन को उपलब्ध करवाए गए। पौध वितरण के समय लाभार्थी के जन आधार कार्ड अथवा आधार कार्ड की जानकारी संधारित की गई ताकि योजना के प्रबोधन और मूल्यांकन में आसानी हो सके। साथ ही औषधीय पौधों के वितरण में पारदर्शिता बनी रहे।

 पूनम खंडेलवाल 

सूचना एवं जनसम्पर्क अधिकारी

Thursday, November 11, 2021

जब ओशो की पुस्तक ने मेरा ढंग तरीका ही बदल दिया

आज भी प्रश्न मौजुद हैं--कौन देगा उत्तर?

सत्तर का दशक था। समय मेरी उम्र रही होगी शायद 15-16 बरस। हाथों में थी ओशो की एक पुस्तक। शायद नाम था भारत के ज्वलंत प्रश्न या जलते प्रश्न। पेपर बैक एडिशन था। भूल गया हूँ की साधना पैकेट बुक्स की प्रकाशन थी या डायमंड वालों की। पिता जी मुंबई से लौटे तो मेरे लिए ओशो की कुछ किताबें लेते आए थे। 

पुस्तक में चुंबकीय आकर्षण था। मैं उसे जल्दी से पढ़ कर समाप्त करना चाहता था। इसलिए घर हो जा बाहर यह पुस्तक मेरे हाथ में ही रहती। इतने में पड़ोस से कोई वृद्ध महिला परिवार से मिलने आई। मेरे हाथ में ओशो की पुस्तक देख कर बोली तू ऐसी किताबें पढ़ता है क्या?मुझे बहुत अजीब सा लगा लेकिन उसी वक्त फैसला कर लिया कि  अब तो  ओशो की पुस्तक हाथ में ही रहा करेगी। तब से अब तक ओशो और मैं निरंतर सम्पर्क में हैं। ओशो के शब्दों के ज़रिए मुलाकात होती रहती है। आने वाले समय में ओशो का प्रभाव अभी और बढ़ेगा। 

आज यह सब याद आया इंटरनेट देखते हुए। वही किताब। टाईटल कुछ नया है। मनसा मोहिनी जी ने बहुत सुंदर ढंग तरीके से अपने ब्लॉग में से इस समग्री को प्रकाशित किया है। ओशो की उस पुस्तक ने देखने, सोचने और समझने तरीका ही बदल दिया था। इन किताबों को पढ़ कर आँख में आँख डाल कर सामने वाले के  एक एक शब्द को सुनना और एक एक शब्द का बारीकी से पोस्टमार्टम करते हुए हर बात का जवाब देना आ गया। 

एक उपलब्धि सी महसूस होती। एक निडरता का अहसास होता। इस तरह ओशो की किताबें जीवन का अंग बनती चली गईं। देखिए उसी पुस्तक में से एक अंश: 

भारत समस्याओं से और प्रश्नों से भरा है। और सबसे बड़ा आश्चर्य तो यह है कि हमारे पास उत्तरों की और समाधानों की कोई कमी नहीं है। शायद जितने प्रश्न हैं हमारे पास, उससे ज्यादा उत्तर हैं और जितनी समस्याएं हैं, उससे ज्यादा समाधान हैं। लेकिन एक भी समस्या का कोई समाधान हमारे पास नहीं है। समाधान बहुत हैं, लेकिन सब समाधान मरे हुए हैं और समस्याएं जिंदा हैं। उनके बीच कोई तालमेल नहीं है। मरे हुए उत्तर हैं और जीवंत प्रश्न हैं। जिंदा प्रश्न हैं और मरे हुए उत्तर हैं।

मरे हुए उत्तर हैं और जीवित प्रश्न हैं। और जैसे मरे हुए आदमी और जिंदा आदमी के बीच कोई बातचीत नहीं हो सकती ऐसे ही हमारे समाधानों और हमारी समस्याओं के बीच कोई बातचीत नहीं हो सकती। एक तरफ समाधानों का ढेर है और एक तरफ समस्याओं का ढेर है। और दोनों के बीच कोई सेतु नहीं है, क्योंकि सेतु हो ही नहीं सकता। मरे हुए उत्तर जिस कौम के पास बहुत हो जाते हैं, उस कौम को नये उत्तर खोजने की कठिनाई हो जाती है।

अब प्रश्नों के साथ एक उलझन है कि प्रश्न सदा नये होते हैं। प्रश्न हमारी फिकर नहीं करते। समस्याएं हमसे पूछ कर नहीं आती हैं, आ जाती हैं। और वे रोज नई हो जाती हैं और हम अपने पुराने समाधानों को जड़ता से पकड़ कर बैठे रह जाते हैं। तब हमें ऐसा लगता है कि समाधान हमारे पास हैं और समस्याएं हल क्यों नहीं होती हैं? गुरु हमारे पास हैं और प्रश्न हल नहीं होते हैं। शास्त्र हमारे पास हैं और जीवन उलझता चला जाता है।

एक बुनियादी भूल, और वह यह है कि सब उत्तर हमारे पुराने हैं। हमने नया उत्तर खोजना बंद कर दिया है। और नये प्रश्न नये उत्तर चाहते हैं। नई समस्याएं नये समाधान मांगती हैं। नई परिस्थितियां नई चेतना को चुनौती देती हैं, लेकिन हम पुराने होने की जिद्द किए बैठे हैं। हम इतने पुराने हो गए हैं और हम पुराने होने के इतने आदी हो गए हैं कि अब हमें खयाल भी नहीं आता कि हम पुराने पड़ गए हैं।

हमारे देश के सामने इसलिए पहला जीता सवाल यह है कि हम मरे हुए उत्तरों को विदा कब करेंगे? उनसे हम छुटकारा कब पाएंगे? उनसे हम कब मुक्त होंगे? क्या कारण है कि हमने नये प्रश्नों के नये उत्तर नहीं खोजे? यही कारण है–अगर हमें खयाल हो कि हमारे पास उत्तर हैं ही रेडीमेड, तैयार, तो हम नये उत्तर क्यों खोजें? मन की तो सहज इच्छा होती है लीस्ट रेसिस्टेंस की; कम से कम तकलीफ उठानी पड़े। उत्तर तैयार हैं तो उसी से काम चला लें। एकबारगी हमारे देश को अपने पुराने उत्तरों से मुक्त और रिक्त हो जाना पड़ेगा तभी हम उस बेचैनी में पड़ेंगे कि हम नई समस्याओं के लिए नये उत्तर खोजें।

हमें अपने अतीत से मुक्त होना पड़ेगा तो ही अपने भविष्य के लिए निर्माण कर सकते हैं। हमें अपने शास्त्रों से मुक्त होना पड़ेगा तो ही हम चिंतन के जगत में प्रवेश कर सकते हैं, अन्यथा हर चीज का तैयार उत्तर हमें किताब में मिल जाता है। मुसीबत आती है, हम गीता खोल लेते हैं। मुसीबत आती है, हम कुरान खोल लेते हैं। मुसीबत आती है, हम मुर्दा गुरुओं के पास पहुंच जाते हैं पूछने कि उत्तर क्या है? हम हमेशा अतीत से पूछते हैं, बीते हुए दिनों से पूछते हैं। लेकिन दुनिया में एक बड़ी क्रांति हो गई है, वह समझ लेनी चाहिए। और अगर वह हम न समझ पाएंगे तो हमारे प्रश्न रोज बढ़ते जायेंगे और हम एक भी प्रश्न को हल न कर सकेंगे। इसी विषय पर आप कुछ और सामग्री पढ़ सकते हैं यहाँ क्लिक कर के ओशो सतसंग में। 

Tuesday, October 26, 2021

त्यौहार से कहीं बड़ा रिश्ता है--किसी व्रत की कोई गुंजाईश नहीं

 पढ़िए इस लाईफ स्टाईल और अप्रोच को-ज़िंदगी बदल जाएगी  


सोशल मीडिया: 26 अक्टूबर 2021 (रेक्टर कथूरिया//मन के रंग)::

मेरा किसी उपवास, व्रत या त्यौहार से कोई विरोध नहीं है। जो लोग इसके नाम पर आडंबर करते हैं और छुप कर खा पी लेते हैं उनसे भी मैंने कभी विरोध नहीं जताया फिर करवा चौथ तो धर्म कर्म और आस्था से जुड़ा हुआ है। इसके विरोध का सवाल ही पैदा नहीं होता। लेकिन इसी त्यौहार के अवसर पर कुछ ऐसा दिखा कि लगा यही बात असली है। 

मीडिया के पास बहुत सी तस्वीरें जन्मदिन पर छपने आती हैं। बहुत सी तस्वीरें वर्षगांठ पर छपने के लिए आती हैं। यह तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है। तस्वीर है हम सभी के जानेमाने लेखक प्रकाश बादल और और उनकी जीन संगिनी इंदिरा ठाकुर की। उन्होंने 25 अक्टूबर 2021 को सुबह 7:30 बजे पोस्ट की। 

प्रकाश बादल साहिब पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ट सियासतदान प्रकाश बादल के हमनाम हैं। हिमाचल में रहते हैं और जानेमाने फ्रीलांस भी पत्रकार हैं। कभी अजीत समाचार से भी गहरे से जुड़े रहे। वन विभाग में कार्यरत रहने से प्रकृति की सरलता और इसी सरलता में छुपे बहुत से रहस्यों से भी अवगत होते रहे। समय समय पर इन्हें अपनी लेखनी में उजागर करते भी रहते हैं। कलम की धार अक्सर बहुत पैनी भी हो जाया करती है। एक बार पढ़ लो तो याद रहते हैं। इस बार की पोस्ट भी कुछ ऐसी है जो उन्होंने अपनी पत्नी इंदिरा ठाकुर जी के प्रेम में लिखी है। आजकल के युग में शादी के बाद भी यह प्रेम बना रहे यह किसी चमत्कार से कम नहीं। पढ़िए, ध्यान से पढ़िए और आपका ध्यान अपने अंतर्मन में भी चला ही जाएगा। फिर हो सके तो अपने वैवाहिक जीवन पर भी सोचिए। वहां भी कुछ ऐसी झलक मिले तो आप भाग्यशाली हैं। न मिले तो प्रकाश बादल साहिब से गुर सीखने की व्यवस्था अवश्य करें। 


बादल साहिब कहते हैं: करवा चौथ की चकाचौंध हो या उदासियों के सन्नाटे, ऊबड़-खाबड़ रस्ते हों या फूलों भरी क्यारियां, पीड़ा के भंवर हों या खुशियों की उड़ानें। हम हमेशा साथ रहे हैं।  मेरी जिदें रहीं तो इंद्रा के समझौते, मेरा अहंकार रहा तो उसका समर्पण,  मेरी पीड़ा रही तो उसका मरहम , मेरे सपने रहे तो उसके पंख। हमारा साथ कुछ ऐसा है। उसने मुझे बचाने-बनाने के लिये कोई कसर नहीं छोड़ी बल्कि मुझ जैसे नालायक से विवाह करके जीवन बड़े दांव पर लगा दिया। मेरे जीवन पर वो सुरक्षा की एक झिल्ली की तरह चिपकी हुई है, ऐसे में किसी व्रत की कोई गुंजाईश नहीं। उसके दिल में मुहब्बत के रंगों से भरी जो मेरी तस्वीर दिखाई देती है उसके आगे हाथ पर मेंहदी से लिखे बनावटी नाम की आकृति की क्या बिसात। मेंहदी का रंग तो साज-सज्जा का एक क्षणिक ज़रिया है परंतु इंद्रा के भीतर के मुहब्बतों के रंग बड़े चटख हैं। ऐसे में हम किसी व्रत के बंधन में नहीं मुहब्बत के बंधन में जी रहे हैं। हमारे लिए चाँद-चाँद ही है, चाहे करवा चौथ का हो या किसी पूर्णिमा का। हम जीवन की नदी में बहते जा रहे हैं, इंद्रा खुद को मेरे लिए ज़ाया कर रही है तो मैं उसके लिए अंजुरी भर खुशी जुटाने की कवायद में अब तक नाकाम!

पढ़ने के बाद मेरे मुँह से तो अनायास यही निकला:असली बात--असली रंग--असली ज़िंदगी--असली त्यौहार-असली नायक--असली नायका ...प्रकाश बादल और इंदिरा ठाकुर----ज़िंदाबाद ज़िंदाबाद