Thursday, November 11, 2021

जब ओशो की पुस्तक ने मेरा ढंग तरीका ही बदल दिया

आज भी प्रश्न मौजुद हैं--कौन देगा उत्तर?

सत्तर का दशक था। समय मेरी उम्र रही होगी शायद 15-16 बरस। हाथों में थी ओशो की एक पुस्तक। शायद नाम था भारत के ज्वलंत प्रश्न या जलते प्रश्न। पेपर बैक एडिशन था। भूल गया हूँ की साधना पैकेट बुक्स की प्रकाशन थी या डायमंड वालों की। पिता जी मुंबई से लौटे तो मेरे लिए ओशो की कुछ किताबें लेते आए थे। 

पुस्तक में चुंबकीय आकर्षण था। मैं उसे जल्दी से पढ़ कर समाप्त करना चाहता था। इसलिए घर हो जा बाहर यह पुस्तक मेरे हाथ में ही रहती। इतने में पड़ोस से कोई वृद्ध महिला परिवार से मिलने आई। मेरे हाथ में ओशो की पुस्तक देख कर बोली तू ऐसी किताबें पढ़ता है क्या?मुझे बहुत अजीब सा लगा लेकिन उसी वक्त फैसला कर लिया कि  अब तो  ओशो की पुस्तक हाथ में ही रहा करेगी। तब से अब तक ओशो और मैं निरंतर सम्पर्क में हैं। ओशो के शब्दों के ज़रिए मुलाकात होती रहती है। आने वाले समय में ओशो का प्रभाव अभी और बढ़ेगा। 

आज यह सब याद आया इंटरनेट देखते हुए। वही किताब। टाईटल कुछ नया है। मनसा मोहिनी जी ने बहुत सुंदर ढंग तरीके से अपने ब्लॉग में से इस समग्री को प्रकाशित किया है। ओशो की उस पुस्तक ने देखने, सोचने और समझने तरीका ही बदल दिया था। इन किताबों को पढ़ कर आँख में आँख डाल कर सामने वाले के  एक एक शब्द को सुनना और एक एक शब्द का बारीकी से पोस्टमार्टम करते हुए हर बात का जवाब देना आ गया। 

एक उपलब्धि सी महसूस होती। एक निडरता का अहसास होता। इस तरह ओशो की किताबें जीवन का अंग बनती चली गईं। देखिए उसी पुस्तक में से एक अंश: 

भारत समस्याओं से और प्रश्नों से भरा है। और सबसे बड़ा आश्चर्य तो यह है कि हमारे पास उत्तरों की और समाधानों की कोई कमी नहीं है। शायद जितने प्रश्न हैं हमारे पास, उससे ज्यादा उत्तर हैं और जितनी समस्याएं हैं, उससे ज्यादा समाधान हैं। लेकिन एक भी समस्या का कोई समाधान हमारे पास नहीं है। समाधान बहुत हैं, लेकिन सब समाधान मरे हुए हैं और समस्याएं जिंदा हैं। उनके बीच कोई तालमेल नहीं है। मरे हुए उत्तर हैं और जीवंत प्रश्न हैं। जिंदा प्रश्न हैं और मरे हुए उत्तर हैं।

मरे हुए उत्तर हैं और जीवित प्रश्न हैं। और जैसे मरे हुए आदमी और जिंदा आदमी के बीच कोई बातचीत नहीं हो सकती ऐसे ही हमारे समाधानों और हमारी समस्याओं के बीच कोई बातचीत नहीं हो सकती। एक तरफ समाधानों का ढेर है और एक तरफ समस्याओं का ढेर है। और दोनों के बीच कोई सेतु नहीं है, क्योंकि सेतु हो ही नहीं सकता। मरे हुए उत्तर जिस कौम के पास बहुत हो जाते हैं, उस कौम को नये उत्तर खोजने की कठिनाई हो जाती है।

अब प्रश्नों के साथ एक उलझन है कि प्रश्न सदा नये होते हैं। प्रश्न हमारी फिकर नहीं करते। समस्याएं हमसे पूछ कर नहीं आती हैं, आ जाती हैं। और वे रोज नई हो जाती हैं और हम अपने पुराने समाधानों को जड़ता से पकड़ कर बैठे रह जाते हैं। तब हमें ऐसा लगता है कि समाधान हमारे पास हैं और समस्याएं हल क्यों नहीं होती हैं? गुरु हमारे पास हैं और प्रश्न हल नहीं होते हैं। शास्त्र हमारे पास हैं और जीवन उलझता चला जाता है।

एक बुनियादी भूल, और वह यह है कि सब उत्तर हमारे पुराने हैं। हमने नया उत्तर खोजना बंद कर दिया है। और नये प्रश्न नये उत्तर चाहते हैं। नई समस्याएं नये समाधान मांगती हैं। नई परिस्थितियां नई चेतना को चुनौती देती हैं, लेकिन हम पुराने होने की जिद्द किए बैठे हैं। हम इतने पुराने हो गए हैं और हम पुराने होने के इतने आदी हो गए हैं कि अब हमें खयाल भी नहीं आता कि हम पुराने पड़ गए हैं।

हमारे देश के सामने इसलिए पहला जीता सवाल यह है कि हम मरे हुए उत्तरों को विदा कब करेंगे? उनसे हम छुटकारा कब पाएंगे? उनसे हम कब मुक्त होंगे? क्या कारण है कि हमने नये प्रश्नों के नये उत्तर नहीं खोजे? यही कारण है–अगर हमें खयाल हो कि हमारे पास उत्तर हैं ही रेडीमेड, तैयार, तो हम नये उत्तर क्यों खोजें? मन की तो सहज इच्छा होती है लीस्ट रेसिस्टेंस की; कम से कम तकलीफ उठानी पड़े। उत्तर तैयार हैं तो उसी से काम चला लें। एकबारगी हमारे देश को अपने पुराने उत्तरों से मुक्त और रिक्त हो जाना पड़ेगा तभी हम उस बेचैनी में पड़ेंगे कि हम नई समस्याओं के लिए नये उत्तर खोजें।

हमें अपने अतीत से मुक्त होना पड़ेगा तो ही अपने भविष्य के लिए निर्माण कर सकते हैं। हमें अपने शास्त्रों से मुक्त होना पड़ेगा तो ही हम चिंतन के जगत में प्रवेश कर सकते हैं, अन्यथा हर चीज का तैयार उत्तर हमें किताब में मिल जाता है। मुसीबत आती है, हम गीता खोल लेते हैं। मुसीबत आती है, हम कुरान खोल लेते हैं। मुसीबत आती है, हम मुर्दा गुरुओं के पास पहुंच जाते हैं पूछने कि उत्तर क्या है? हम हमेशा अतीत से पूछते हैं, बीते हुए दिनों से पूछते हैं। लेकिन दुनिया में एक बड़ी क्रांति हो गई है, वह समझ लेनी चाहिए। और अगर वह हम न समझ पाएंगे तो हमारे प्रश्न रोज बढ़ते जायेंगे और हम एक भी प्रश्न को हल न कर सकेंगे। इसी विषय पर आप कुछ और सामग्री पढ़ सकते हैं यहाँ क्लिक कर के ओशो सतसंग में। 

Tuesday, October 26, 2021

त्यौहार से कहीं बड़ा रिश्ता है--किसी व्रत की कोई गुंजाईश नहीं

 पढ़िए इस लाईफ स्टाईल और अप्रोच को-ज़िंदगी बदल जाएगी  


सोशल मीडिया: 26 अक्टूबर 2021 (रेक्टर कथूरिया//मन के रंग)::

मेरा किसी उपवास, व्रत या त्यौहार से कोई विरोध नहीं है। जो लोग इसके नाम पर आडंबर करते हैं और छुप कर खा पी लेते हैं उनसे भी मैंने कभी विरोध नहीं जताया फिर करवा चौथ तो धर्म कर्म और आस्था से जुड़ा हुआ है। इसके विरोध का सवाल ही पैदा नहीं होता। लेकिन इसी त्यौहार के अवसर पर कुछ ऐसा दिखा कि लगा यही बात असली है। 

मीडिया के पास बहुत सी तस्वीरें जन्मदिन पर छपने आती हैं। बहुत सी तस्वीरें वर्षगांठ पर छपने के लिए आती हैं। यह तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है। तस्वीर है हम सभी के जानेमाने लेखक प्रकाश बादल और और उनकी जीन संगिनी इंदिरा ठाकुर की। उन्होंने 25 अक्टूबर 2021 को सुबह 7:30 बजे पोस्ट की। 

प्रकाश बादल साहिब पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ट सियासतदान प्रकाश बादल के हमनाम हैं। हिमाचल में रहते हैं और जानेमाने फ्रीलांस भी पत्रकार हैं। कभी अजीत समाचार से भी गहरे से जुड़े रहे। वन विभाग में कार्यरत रहने से प्रकृति की सरलता और इसी सरलता में छुपे बहुत से रहस्यों से भी अवगत होते रहे। समय समय पर इन्हें अपनी लेखनी में उजागर करते भी रहते हैं। कलम की धार अक्सर बहुत पैनी भी हो जाया करती है। एक बार पढ़ लो तो याद रहते हैं। इस बार की पोस्ट भी कुछ ऐसी है जो उन्होंने अपनी पत्नी इंदिरा ठाकुर जी के प्रेम में लिखी है। आजकल के युग में शादी के बाद भी यह प्रेम बना रहे यह किसी चमत्कार से कम नहीं। पढ़िए, ध्यान से पढ़िए और आपका ध्यान अपने अंतर्मन में भी चला ही जाएगा। फिर हो सके तो अपने वैवाहिक जीवन पर भी सोचिए। वहां भी कुछ ऐसी झलक मिले तो आप भाग्यशाली हैं। न मिले तो प्रकाश बादल साहिब से गुर सीखने की व्यवस्था अवश्य करें। 


बादल साहिब कहते हैं: करवा चौथ की चकाचौंध हो या उदासियों के सन्नाटे, ऊबड़-खाबड़ रस्ते हों या फूलों भरी क्यारियां, पीड़ा के भंवर हों या खुशियों की उड़ानें। हम हमेशा साथ रहे हैं।  मेरी जिदें रहीं तो इंद्रा के समझौते, मेरा अहंकार रहा तो उसका समर्पण,  मेरी पीड़ा रही तो उसका मरहम , मेरे सपने रहे तो उसके पंख। हमारा साथ कुछ ऐसा है। उसने मुझे बचाने-बनाने के लिये कोई कसर नहीं छोड़ी बल्कि मुझ जैसे नालायक से विवाह करके जीवन बड़े दांव पर लगा दिया। मेरे जीवन पर वो सुरक्षा की एक झिल्ली की तरह चिपकी हुई है, ऐसे में किसी व्रत की कोई गुंजाईश नहीं। उसके दिल में मुहब्बत के रंगों से भरी जो मेरी तस्वीर दिखाई देती है उसके आगे हाथ पर मेंहदी से लिखे बनावटी नाम की आकृति की क्या बिसात। मेंहदी का रंग तो साज-सज्जा का एक क्षणिक ज़रिया है परंतु इंद्रा के भीतर के मुहब्बतों के रंग बड़े चटख हैं। ऐसे में हम किसी व्रत के बंधन में नहीं मुहब्बत के बंधन में जी रहे हैं। हमारे लिए चाँद-चाँद ही है, चाहे करवा चौथ का हो या किसी पूर्णिमा का। हम जीवन की नदी में बहते जा रहे हैं, इंद्रा खुद को मेरे लिए ज़ाया कर रही है तो मैं उसके लिए अंजुरी भर खुशी जुटाने की कवायद में अब तक नाकाम!

पढ़ने के बाद मेरे मुँह से तो अनायास यही निकला:असली बात--असली रंग--असली ज़िंदगी--असली त्यौहार-असली नायक--असली नायका ...प्रकाश बादल और इंदिरा ठाकुर----ज़िंदाबाद ज़िंदाबाद


Friday, August 27, 2021

मन की शक्ति को पहचान पाना इतना कठिन भी नहीं

बस थोड़ा सा अभ्यास और मन बहुत अच्छा मित्र बन जाता है 

चंडीगढ़: 27 अगस्त 2021: (कार्तिका सिंह//मन के रंग)::

मन के रहस्य बहुत गहरे हैं। ध्यान दो तो समझ भी आने लगते हैं और गंभीरता से न लो तो सारी सारी उम्र निकल जाती है लेकिन समझ नहीं आते। अगर गुरुबाणी कहती है मन जीते जग जीत तो बात बहुत सच्ची है। गहरी भी है। अगर मन को जीतना चाहो तो इतना ज़्यादा कठिन भी कुछ नहीं है। एक बार बुल्ले शाह पौदे लगा रहे थे तो किसी रह जाते जज्ञासु मित्र ने सवाल किया भगवान को कैसे पाया जाए? बुल्ले शाह बहुत ही सहजता से हँसते हुए बोले यह कौन सा मुश्किल काम? साथ ही पंजाबी शायरी--बुल्लिया रब दा की पाओणा-एधरों पुट्टणा ते ओधर  लाउणा। अर्थात मन को दुनियादारी से हटा क्र भगवान की तरफ जोड़ लो। बिलकुल इसी तरह जैसे मैं यह पैदा इधर से उखाड़ कर उधर दूसरी जगह लगा देता हूँ। मन को साध लेना इसी सतत कोशिश का नाम है। इसी निरंतर साधना से भी सम्भव है। मन पर निगाह रखो तो मन भी समझने लगता है कि मालिक की नज़र है मुझ पर। इधर उधर नहीं भटकना। 

इसी तरह विवेकानंद भी मन की चर्चा करते हुए मन की कमज़ोरियां भी समझाते  हैं।  बहुत सुंदर शब्दों में और बहुत ही संक्षिप्त शब्दों में विवेकानंद जी कहते हैं:यह समझना बहुत कठिन है, परंतु धीरे धीरे समझ सकोगे कि संसार की कोई भी वस्तु तुम्हारे ऊपर तब तक प्रभाव नहीं डाल सकती, जब तक कि तुम स्वयं ही उसे अपना प्रभाव न डालने दो।  स्वामी विवेकानन्द जी को {वि.सा.- ३ : कर्मयोग: अनासक्ति ही पूर्ण आत्मत्याग है} में अधीन किया जा सकता है। 

अपने निकटम विवेकानंद केंद्र से जुड़िये मन की बातें  होगी और इस शक्ति का आप सदुपयोग कर सकेंगे। 

Tuesday, August 17, 2021

मन किसी एक का होकर नहीं रह सकता--ओशो

 कहीं तो प्रशिक्षण लेना पड़ेगा मन को साधने का 


ओशो मन पर बहुत गहरी चोट करते हैं। शायद यही तरीका है मन की शक्ति से लाभ लेने का। मन पर सिर्फ चोट ही नहीं करते  उसे जागरूक भी बनाते हैं। उसे जगाते भी हैं। उसी के साथ सोई हुई शक्तियां जागती हैं। साथ ही भारतीय संस्कृति और धर्म की उन बातों का मर्म भी समझाते हैं जो हम लकीर के फकीर बन कर  माने तो चले जाते हैं लेकिन  उसकी थाह आज तक नहीं समझ पाए। 

ओशो कहते हैं: *मन वेश्या की तरह है। किसी का नहीं है मन। आज यहां, कल वहां; आज इसका, कल उसका।*

मन की कोई मालकियत नहीं है। और मन की कोई ईमानदारी नहीं है। 

*मन बहुत बेईमान है। वह वेश्या की तरह है। वह किसी एक का होकर नहीं रह सकता।* 

और जब तक तुम एक के न हो सको, तब तक तुम एक को कैसे खोज पाओगे?

*न तो प्रेम में मन एक का हो सकता है; न श्रद्धा में मन एक का हो सकता है—और एक के हुए बिना तुम एक को न पा सकोगे*। 

तो कहीं तो प्रशिक्षण लेना पड़ेगा—एक के होने का।

*इसी कारण पूरब के मुल्कों ने एक पत्नीव्रत को या एक पतिव्रत को बड़ा बहुमूल्य स्थान दिया।* 

उसका कारण है। उसका कारण सांसारिक व्यवस्था नहीं है। उसका कारण एक गहन समझ है। *वह समझ यह है कि अगर कोई व्यक्ति एक ही स्त्री को प्रेम करे, और एक ही स्त्री का हो जाए, तो शिक्षण हो रहा है एक के होने का*। 

*एक स्त्री अगर एक ही पुरुष को प्रेम करे और समग्र—भाव से उसकी हो रहे कि दूसरे का विचार भी न उठे, तो प्रशिक्षण हो रहा है; तो घर मंदिर के लिए शिक्षा दे रहा है; तो गृहस्थी में संन्यास की दीक्षा चल रही है।*

 *अगर कोई व्यक्त्ति एक स्त्री का न हो सके, एक पुरुष का न हो सके, फिर एक गुरु का भी न हो सकेगा; क्योंकि उसका कोई प्रशिक्षण न हुआ।* 

*जो व्यक्ति एक का होने की कला सीख गया है संसार में, वह गुरु के साथ भी एक का हो सकेगा।* 

*और एक गुरु के साथ तुम न जुड़ पाओ तो तुम जुड़ ही न पाओगे*। 

वेश्या किसी से भी तो नहीं जुड़ पाती। और बड़ी, आश्चर्य की बात तो यह है कि *वेश्या इतने पुरुषों को प्रेम करती है, फिर भी प्रेम को कभी नहीं जान पाती*।

अभी एक युवती ने संन्यास लिया। वह आस्ट्रेलिया में वेश्या का काम करती रही। उसने कभी प्रेम नहीं जाना। *यहां आकर वह एक युवक के प्रेम में पड़ गई, और पहली दफा उसने प्रेम जाना। और उसने मुझे आकर कहा कि इस प्रेम ने ही मुझे तृप्त कर दिया; अब मुझे किसी की भी कोई जरूरत नहीं है*। और उसने कहा कि आश्चर्यों का आश्चर्य तो यह है कि मैं तो बहुत पुरुषों के संबंध में रही; लेकिन मुझे प्रेम का कभी अनुभव ही नहीं हुआ।

*प्रेम का अनुभव हो ही नहीं सकता बहुतों के साथ।* 

*बहुतों के साथ केवल ज्यादा से ज्यादा शरीर का भोग, उसका अनुभव हो सकता है।* 

*एक के साथ आत्मा का अनुभव होना शुरू होता है; क्योंकि एक में उस परम एक की झलक है। छोटी झलक है, बहुत छोटी; लेकिन झलक उसी की है*.............

 _*ओशो*_  

 *सुन भई साधो–(प्रवचन–17)*

मन की उलझनें जब सुलझने लगती हैं तो इंसान बिलकुल नया ही बन जाता है। ओशो इस सारी  कैमिस्ट्री को बहुत अच्छी तरह जानते हैं। इसी लिए उनके शब्द पलों में ही सब बदल देते हैं। नेपाली ओशो कहते हैं:


मन के जोड़ का ,

         सारा खेल है ।

मन को तुम शरीर ,

         से जोड़ दो .!

             संसारी हो जाते हो .!!

 और मन को तुम ,

       आत्मा से जोड़ दो ;

            सन्यासी हो जाते हो .!!#ओशो


Thursday, August 27, 2020

जब मौत सामने नज़र आ रही हो उस वक़्त....

 उस वक़्त का वशिष्ठ अनुभव दिखा रहे हैं ओशो 
सोशल मीडिया27 अगस्त 2020: (मीडिया लिंक//मन के रंग डेस्क)
महाराष्ट्र में एक साधु था, एकनाथ। उसके पास एक व्यक्ति बहुत दिनों तक आया। और उस व्यक्ति ने अनेक दफा एकनाथ से बहुत से प्रश्न पूछे। एक बार उसने एक अजीब बात एकनाथ से पूछी, सुबह ही थी और एकनाथ अपने मंदिर में बैठे हुए थे। उस युवक ने आकर पूछा कि मैं आपको जानता हूं, बहुत दिन से जानता हूं और आपको जान कर मुझे कई तरह के विचार मन में उठते हैं, कई प्रश्न उठते हैं। एक प्रश्न मैं हमेशा छिपा लेता हूं, पूछता नहीं हूं, वह मैं आज पूछना चाहता हूं। एकनाथ ने कहा क्या है पूछो? उस युवा ने कहा कि मैं पूछना चाहता हूं, आपका बाहर से तो जीवन एकदम पवित्र है, लेकिन भीतर भी पवित्रता है या नहीं? आप बाहर से तो एकदम ही ईश्वरीय मालूम होते हैं, दिव्य मालूम होते हैं, लेकिन भीतर क्या है? मैं भीतर के संबंध में कुछ पूछना चाहता हूं? भीतर आपके पाप उठते हैं या नहीं? भीतर आपके बुराइयां पैदा होती हैं या नहीं? भीतर आपके विकार उठते हैं या नहीं? 
एकनाथ ने कहा कि मैं अभी-अभी बताता हूं, एक और जरूरी बात तुम्हें बता दूं, कहीं मुझे भूल न जाए। कल अचानक मैंने तुम्हारा हाथ देखा तो मुझे दिखाई पड़ा कि तुम्हारी मृत्यु करीब आ गई है। सात दिन बाद तुम मर जाओगे तो यह मैं तुम्हें बता दूं और फिर तुम्हारे प्रश्न का उत्तर दूं, क्योंकि कहीं मुझे भूल न जाए, इसलिए मैं जल्दी बता दूं। एकनाथ ने कहा कि अब पूछो तुम क्या पूछते हो? वह युवक बैठा था खड़ा हो गया। उसने कहा कि मौका मिला तो मैं कल आऊंगा। उसके हाथ पैर कंपने लगे। एकनाथ ने पूछा इतनी जल्दी क्या है, सात दिन हैं, बहुत हैं, इतनी घबड़ाहट क्या है? और मरना तो सभी को पड़ता है। लेकिन वह युवक अब एकनाथ की बातें नहीं सुन रहा था। उसने पीठ फेर ली और वह मंदिर के नीचे उतरने लगा। अभी जब आया था तो पैरों में एक बल था, एक शक्ति थी, एक सामथ्र्य था। अब जब लौट रहा था तो दीवाल का सहारा लिए हुए था। जिसकी मौत सात दिन बात हो, वह बूढ़ा हो ही गया। उसके पैर कंपने लगे सीढ़ियों पर, वह रास्ते पर जाकर गिर पड़ा। बेहोश हो गया, लोगों ने उसे उठाया और घर पहुंचाया। उसके प्रियजन और उसके मित्र इकट्ठे हो गए, सब तरफ खबर फैल गई कि वह आदमी अब मरने के करीब है। सात दिन बात उसकी मृत्यु आ जाएगी।
सातवें दिन संध्या को जब सूरज डूबने को था और सारे घर के लोग रो रहे थे, पड़ोसी इकट्ठे थे और वह युवा बिस्तर पर लेटा हुआ था। एकनाथ उसके घर गए। वे जब अंदर पहुंचे तो वहां मौत का पूरा का पूरा वातावरण था। सारे लोग उनको देख कर रोने लगे। एकनाथ ने कहाः रोओ मत। मुझे जरा अंदर ले चलो। वे भीतर गए और उस व्यक्ति को उन्होंने हिला कर पूछा कि मेरे मित्र, एक बात पूछने आया हूं, सात दिन कोई पाप तुम्हारे भीतर उठा? कोई बुराई, कोई विकार। उस आदमी ने बहुत मुश्किल से आंखें खोलीं और उसने कहा कि आप भी एक मरते हुए आदमी से मजाक करते हैं। तो एकनाथ ने कहाः तुमने भी एक मरते हुए आदमी से मजाक किया था। एकनाथ ने कहा तुम्हारी मौत अभी नहीं आई है, तुम्हारे प्रश्न का उत्तर दिया है।
जिसे मौत दिखाई पड़ने लगे, उसके भीतर पाप उठने अपने आप विलीन हो जाते हैं। विकार शून्य हो जाते हैं। और जिसे मौत दिखाई पड़ने लगे, उसके भीतर एक क्रांति हो जाती है। उसकी संसार के प्रति पीठ हो जाती है। और परमात्मा की तरफ उसका मुंह हो जाता है। एकनाथ ने कहाः तुम्हारी मौत अभी आई नहीं, तुम्हारे प्रश्न का उत्तर दिया है। तुम उठ आओ, घबड़ाओ मत। और एकनाथ ने कहा कि सात दिन बाद मौत हो, या सात वर्ष बाद, या सत्तर वर्ष बाद, क्या फर्क पड़ता है? मौत का होना ही पर्याप्त है, दिनों की गिनती से कोई फर्क नहीं पड़ता है। या कि कोई फर्क पड़ता है? सात दिन बात मौत हो, या सत्तर दिन बाद, क्या फर्क पड़ता है? मौत का होना ही अर्थपूर्ण है। दिनों की गिनती कोई अर्थ नहीं रखती। एकनाथ ने कहाः मृत्यु है, जिस दिन यह मुझे पता चला, उसी दिन जीवन में क्रांति हो गई। उसी दिन मैं दूसरा आदमी हो गया।    ---ओशो

Tuesday, March 10, 2020

होली का यह रंग और मैं.....

औंधे मुंह बाजार गिरा है;क्या बोलें अब रंग और मैं 
मन की एक पतंग और मैं!
कई असमानी रंग और मैं!

दंगा, पंगा, रंग और मैं।
मन कितना बेरंग और मैं।

खुशियां भी अब गम जैसी हैं,
गम का काला रंग और मैं। 

इक दूजे को देख रहे हैं!
कब से जारी जंग और मैं।

देश की हालत देख के दंग हैं!
होली का यह रंग और मैं।

दोनों ही हैरान खड़े हैं
होली का हुड़दंग और मैं।

औंधे मुंह बाजार गिरा है
क्या बोलें अब रंग और मैं।

जगह जगह शाहीन बाग हैं,
कैसे लोक रंग और मैं।

बेचैनी, परेशानी, दंगा!
कैसे देश के रंग और मैं।

फागुन गुज़र रहा है फिर भी,
हर मन है बेरंग और मैं। 
               --कार्तिका सिंह 

Friday, April 19, 2013

पीरखाना, बंटी बाबा और करिश्में

एक ऐसा स्थान जहाँ मन भी बदलते हैं और जिंदगी के रंग ढंग भी
लुधियाना की काकोवाल रोड पर स्थित न्यू अग्रवाल पीरखाना एक ऐसा धार्मिक स्थान है जहाँ लोगों के मन बदल दिए जाते हैं। यह सत्य कथा है लुधियाना के ही एक ऐसे व्यक्ति की जो एक ऐसे महत्वपूर्ण सरकारी विभाग की जहाँ वह बहुत ही ख़ास पद पर नियुक्त था। लम्बी नौकरी के बाद आखिर एक दिन रिटायर होने का वक्त भी आ गया। रिटायर होने पर कई किस्म की परेशानियाँ भी आकर घेरने लगीं। बहुत हाथ पाँव मारे लेकिन उलझनें थीं कि कम होने का नाम ही नहीं ले रहीं थीं। एक दिन मित्र के कहने पर पीरखाना पर जा कर सजदा किया। वहां मुलाकात हुई इस दरबार के प्रमुख बंटी बाबा के साथ। वहां बैठते ही बंटी बाबा ने उसकी तरफ देखा और खुद अवाज़ देकर उसे अपने पास बुलाया। साफ़ और सीधे शब्दों में पूछा--क्या यही समस्या है---इसी काम से यहाँ आये हो---? दरबार में पहुंचा व्यक्ति हैरान कि सारी बात यहाँ कैसे मालूम-----लेकिन जवाब तो देना ही था---हाँ की मुद्रा में सर हिल दिया। बाबा ने अगला सवाल पुछा-क्या शराब पीते हो---? जवाब में कहा नहीं----अगला सवाल था क्या बेटा शराब पीता है---? जवाब फिर इनकार में ही था। बाबा ने दो पल के लिए आंख बंद की---सिगरेट से एक सूटा लगाया---और डांट भरी नाराज़ नजर से देखते हुए कहने लगे जब तू भी नहीं पीता--तेरा बीटा भी नहीं पीता तो फिर तेरे घर के अमुक कमरे की अमुक अलमारी में शराब की इतनी बोतलें क्या कर रहीं हैं ? रिटायर्ड अधिकारी की नजरें झुक गयीं---सफाई देते हुए बोला---जी मेहमानों और दोस्तों के लिए रखीं हैं---बंटी बाबा एक बार फिर उसे डांटते हुए बोले मैं यहाँ लोगों की शराब छुड्वाता हूँ और तुम लोगों को पिलाते हो----बांटते हो ?? ऐसा चलेगा तो तेरा काम नहीं हो सकता---! डांट सुन कर  व्यक्ति डर गया--बोला बाबा ऐसा न कहिये---तो बाबा फिर उसकी तरफ देख कर बोले की जा और उन बोतलों को तोड़ कर आ---वह व्यक्ति गया और महंगी शराब की 18 बोतलें उसी रात को तोड़ दीं--....आज वह बहुत ही सुखी व्यक्ति है---बदल गए न मन के रंग--और साथ ही जिंदगी के ढंग---! -आर के तारेश