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Tuesday, December 2, 2025

हालात की हवा कैसे अनुकूल होती है पढ़िए और समझिए...!

बाज़ के लाईफ स्टाईल से भी बहुत कुछ सीखा जा सकता है....!


लुधियाना
: पहली दिसंबर 2025: (मीडिया लिंक कार्तिका कल्याणी सिंह//मन के रंग डेस्क)::

ज़िंदगी में संतुलन और स्थिरता कायम रहे  तो बहुत ही अच्छा गिना जाता है लेकिन हकीकत यह भी है कि चलती का नाम ही गाड़ी कहा जाता है। थम जाए तो वह बात नहीं रहती। जैसे पानी बहता चले तो स्वच्छ भी लगता है और सुंदर भी। कहा जाता है बहते पानी को बिना किसी जाँच पड़ताल के पी भी लिए जाए तो उसका कोई नुक्सान नहीं होता। ज़िंदगी भी चलती रहे तो इस बहती ज़िंदगी का फायदा खुद को भी होता है और दूसरों को भी। यह एक बहुत पुरानी सच्चाई है। 

वैसे हम सभी को इस सवाल का जवाब खुद के मन से भी टटोलना चाहिए कि हम शरीर, मन और सुंदरता के बीच तालमेल और ऑटो हीलिंग को कैसे बेहतर बना सकते हैं या कब, कहां और कैसे शुरू कर सकते हैं।  मन में आए तो यह भी पूछना बन सकता है कि इसकी शुरुआत किस उम्र में की जा सकती है? इसका दायरा कहां तक बढ़ाया जा सकता है। 

इस बात को समझना भी ज़रूरी होता है कि शरीर, मन और सुंदरता के बीच संबंध को बेहतर बनाने और उसमें तालमेल बिठाने के लिए एक समग्र दृष्टिकोण की ज़रूरत होती है जो शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक स्वास्थ्य और सेल्फ-केयर तरीकों को एक साथ लाता है। आप इस प्रक्रिया को कैसे शुरू कर सकते हैं और कैसे बनाए रख सकते? इस तरह के सभी नुक्तों की भी यहां चर्चा की गई है। 

मन को अपने मुताबिक बनाने या ढालने के लिए सबसे पहले माइंडफुलनेस और मानसिक स्वास्थ्यको भी समझा जाना चाहिए। यह प्रक्रिया दो चार मिंट या एक आध दिन की नहीं होती। यह सतत साधना है। इसे निरंतर जारी रख कर ही लाभ महसूस होगा।  

इस मकसद के लिए मेडिटेशन एक आवश्यक हिस्सा है। रोज़ाना माइंडफुलनेस या मेडिटेशन का अभ्यास शुरू करें। ये तनाव कम करने, फोकस बेहतर बनाने और मन की शांति की भावना को बढ़ावा देने में मदद कर सकते हैं। इसमें कुछ सफलता मिलने जे बाद आप पर बरसने लगेगी मन की शक्तियों की कृपा। 

इसी तरह जर्नलिंग का भी अपना अलग महत्व है। अपने विचारों, भावनाओं और लक्ष्यों पर सोचने के लिए एक जर्नल रखें। यह अभ्यास मन को साफ़ करने और आत्म-जागरूकता को बढ़ावा देने में मदद कर सकता है। इससे विचारों आउट भावनाओं पर पकड़ भी बढ़ जाएगी और अप्प स्वयं को पूरी पारदर्शिता के साथ देख सकेंगे। इसके अभ्यास से आपको दुनिया भी पूरी पारदर्शिता से दिखने लगेगी। 

इसी साधना या अभ्यास के चलते थेरेपी या काउंसलिंग: थेरेपी लेना या किसी काउंसलर से बात करना मानसिक स्पष्टता और भावनात्मक सहारा दे सकता है, जिससे आपको जीवन की चुनौतियों का सामना करने में मदद मिलेगी। जहाँ तजोड़ा सा भी धुंधलापन मेहसूद हुआ तो इससे सहायता मिलेगी उसे पूरी सफाई के साथ देखने में। कोई दीवार या धुंधलापन आपको ढोलहा नहीं दे सकेगा।  

लगातार इसी साधना के चलते मन के साथ साथ शरीर की पहेलियाँ भी आपको समझ आने लगेंगीं। मन कई बार अपने खेल शरीर के ज़रिए ही खेलता है। इस लिए शारीरिक स्वास्थ्य उत्तम रहना भी आवश्यक है। 

शरीरक स्वास्थ्य के लिए संतुलित पोषण का चयन करने और उसे अपना रूटीन बनाने में भी अपने आप सहायता मिलने लगेगी। फलों, सब्जियों, लीन प्रोटीन और साबुत अनाज से भरपूर आहार पर ध्यान दें। सही पोषण आपके शरीर को ऊर्जा देता है और शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य दोनों को सहारा देता है। इस पर कोई संदेह नहीं रहेगा। आपकी दॄष्टि और समझ साफ़ होती जाएगी। 

इस सब कुछ के साथ साथ व्यायाम भी महत्वपूर्ण रहेगा। नियमित शारीरिक गतिविधि, चाहे वह योग हो, चलना हो, स्ट्रेंथ ट्रेनिंग हो या नाचना हो, शरीर को मज़बूत और मन को साफ़ रखती है। खासकर योग, शरीर और मन में तालमेल बिठाने के लिए बहुत अच्छा हो सकता है। धीरे धीरे शरीर अपनी आवश्यकता के मुताबिक आपको मनपसंद योग या साधना भी बताने लगेगा। शरीर को ऐसी साधना में एक नशे जैसा अहसास भी होने लगता है लेकिन यह नशा अक्षम नहीं बनाता बल्कि सक्षम बनाता है। 

जब आप अपने दैनिक रूटीन में यह सब शामिल कर लेते हैं तो पर्याप्त आराम भी बेहद ज़रूरी हो जाता है। इसलिए सुनिश्चित करें कि आपको पर्याप्त अच्छी नींद मिल रही है। आराम शारीरिक रिकवरी और मानसिक स्पष्टता दोनों के लिए बहुत ज़रूरी है। इसके बिना न तो नई ऊर्जा संभव है और न ही शरीर, मन, दिल और दिमाग को तरोताज़ा रख पाना। इस लिए किसी भी हालत में आराम का बलिदान नहीं किया जाए। 

पर्याप्त आराम से ही सुंदरता और सेल्फ-केयर की तरफ आवश्यक ध्यान दिया जा सकेगा। इस से शख्सियत में आकर्षण पैदा होता है और छवि प्रभावशाली बनती है। इससे सिर्फ तन ही नहीं मन की सुंदरता भी बढ़ती है। इसी से बढ़ता है चौतरफा आकर्षण और अंतर्मन की सुंदरता। 

इसी साधना के अंतर्गत आता है स्किन-केयर रूटीन। यह भी बहुत महत्वपूर्ण है। आपकी त्वचा किस तरह की है इसका पता होना ही चाहिए। त्वचा की उस किस्म और प्रकार के अनुसार एक स्किनकेयर रूटीन बनाना भिओ ज़रूरी होगा। लगातार देखभाल त्वचा के स्वास्थ्य को बनाए रखने में मदद करती है, जिससे आप सबसे अच्छा महसूस करते हैं और दिखते हैं।

इस विशेष ध्यान से ही संभव हो पता है समग्र उपचार। मसाज, फेशियल या अरोमाथेरेपी जैसे समग्र सौंदर्य उपचारों को शामिल करने पर विचार करना भी ज़रूति काम हो सकता है।  ये मन को आराम दे सकते हैं और शरीर को फिर से जीवंत कर सकते हैं। उसी से बनता है तन, मन और आत्मा में ऊर्र्जा का एक नया स्रोत। 

माइंडफुल ग्रूमिंग की तरफ भी ध्यान देना आवश्यक है। इसका एक अलग ही महत्व है। अपनी रोज़ाना की ग्रूमिंग रूटीन को एक काम के बजाय आत्म-सम्मान और सेल्फ-केयर के रूप में देखें। दृष्टिकोण में यह बदलाव आपकी समग्र भलाई की भावना को बेहतर बना सकता है। इससे आपके मन की शक्ति बढ़ेगी। आप में एक विराटता आएगी। आपके दिमाग की शक्ति भी विशाल होगी और आत्मिक शक्ति भी। 

इन प्रयासों के चलते ही आपके आध्यात्मिक संबंध विकसित होने लगेंगे। आपको इन दिव्य और दैवी शक्तियों का भी अहसास होगा जिनकी शायद आप ने कभी चर्चा भी न सुनी हो। आपको इन शक्तियों के साथ निकटता का अहसास भी होने लगेगा। आपके रास्तें की कठिनाईआं खुद-ब-खुद आसान बनने लगेंगी। 

योग और प्राणायाम भी इस मार्ग पार आपका सहायक बनेगा। योग और प्राणायाम (सांस पर नियंत्रण) जैसे अभ्यास शरीर की ऊर्जा को संतुलित कर सकते हैं और मानसिक फोकस को बेहतर बना सकते हैं, जिससे शरीर, मन और आत्मा के बीच गहरा संबंध बनता है। योग और प्राणायाम का निरंतर अभ्यास आपको चमत्कारों की सच्ची झलक भी दिखाने लगेगा। अगर आप उन चमत्कारों में गम हुए बिना इसे जारी रख सके तो कमाल के परिणाम निकलेंगे। प्रभु से सामना या मिलाप सहज बनने लगेगा। 

इन सभी प्रयासों और अभ्यासों के चलते प्रकृति और ग्राउंडिंग का भी एक खास महत्व होता है और सचमुच  बहुत है। इसके अंतर्गत प्रकृति में समय बिताएं आपको आनंद के अनुभव होने लगेंगे। घास पर नंगे पैर चलना या बाहर मेडिटेशन करना जैसी ग्राउंडिंग तकनीकों का अभ्यास करें। इसका जादू तुरंत महसूस होगा। प्रकृति का शांत करने वाला एक ऐसा प्रभाव होता है जो आपके सामंजस्य की भावना को भी बढ़ा सकता है।  निरंतरता और धैर्य आपको जीवन में कदम कदम पर काम देंगें। 

यह सब देखने में बेशक आसान लगता हो लेकिन होता कठिन ही है। इसे साधने के लिए रूटीन बनाना बहुत ज़रूरी है। शरीर, मन और सुंदरता के बीच तालमेल बनाए रखने के लिए इन तरीकों को शामिल करते हुए एक रोज़ाना का रूटीन बनाना ज़रूरी है। रूटीन से ही साधा जा सकेगा आत्म संयम /आत्म संयम से ही संभव होगा अनुशासन के पालन। अनुशासन से ही मिलेंगी उपलब्धियां। 

जहां आत्म संयम ज़रूरी होता है वहीं आत्म-करुणा भी बहुत ज़रूरी होती है।अपने आप पर धैर्य रखें। सुधार और ठीक होना धीरे-धीरे होने वाली प्रक्रियाएं हैं। छोटी-छोटी जीतों का जश्न मनाएं और इस रास्ते में अपने प्रति दयालु रहें। कई बार ऐसा भी संभव है जब खुद ही खुद पर करुणा करनी पड़ेगी। 

यह सब करते समय लगातार सीखना मत भूलिए। लगातार सीखना आपके कदमों में बहुत कुछ ला रखेगा। बहुत कुछ मिलता है इस साधना को करने से। लगातार सीखना बहुत कुछ उपलब्ध करवा देता है। अनजान रास्ते जानपहचाने लगने लगते हैं। दुश्मन भी मित्र बनने लगते हैं। सीखने वालों की कदर ज़माना करता है। ऊर्जा और आमदनी के स्रोत उनके लिए खुलते चले जाते हैं। 

शिक्षा उम्र भर आपकी मित्र बन सकती है। जहां से भी शिक्षा मिले ले लेनी चाहिए। वेलनेस, पोषण और सुंदरता में नई प्रथाओं के बारे में जानकारी रखें जो आपके लक्ष्यों के साथ मेल खाती हों। ज्ञान आपको अपनी पूरी सेहत के लिए बेहतर विकल्प चुनने की शक्ति देता है। शिक्षा आपका भी भला करेगी, आपके परिवार और समाज का भी। 

इस साधना के साथ साथ इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि अनुकूलन पर भी आपकी पूरी नज़र रहे। जैसे-जैसे आप बढ़ते हैं, आपकी ज़रूरतें बदल सकती हैं। संतुलन और तालमेल बनाए रखने के लिए अपने रूटीन और तरीकों को बदलने के लिए तैयार रहें। अनुकूल अवसरों पर भी नज़र रखनी होगी। यदि वे अनुकूल नहीं हैं तो उन्हें  अपने अनुकूल बनाने पर भी विचार करना होगा। इन लगातार कोशिशों से ही आपको इस तरह के तरीके पता चल जाएंगे जिनसे प्रतिकूल हालात को अनुकूल बनाना आ जाएगा आपको भी। 

यह तरीका आपके शरीर, मन और सुंदरता को पोषण देने, पूरी सेहत और खुद को ठीक करने को बढ़ावा देने के लिए एक टिकाऊ और एकीकृत सिस्टम बनाता है। फिर एक समय आता है जब आपके हालात खुद-ब-अनुकूल बनते चले जाएंगे। 

कुल मिलकर लोग कहने लगेंगे कि इसकी साधना इतनी ज़्यादा है कि इसे तो देखते ही हवा भी इसके अनुकूल हो जाती है। बाकी इसे करके देखने की ज़िम्मेदारी आपको उठानी ही होगी।

हालात की हवा कैसे अनुकूल होती है पढ़िए समझिए और कोशिश करके देखिए 

Saturday, September 14, 2024

मन के रंग तन और माहौल को कैसे प्रभावित करते हैं?

जीवन रहस्य:मन की शक्ति से दुनिया  का सामना आसान हो जाता है 

इस शक्ति को जगाना नामुमकिन नहीं होता थोड़ा मुश्किल बेशक हो 


जंगल के घर ठौर ठिकाने
: 15 मार्च 2024: (कार्तिका कल्याणी सिंह//मन के रंग डेस्क):

तन पर डाले गए बाहरी रंग कैसा असर छोड़ते हैं मन की दुनिया पर 

मन के अंदर सचमुच बहुत शक्तिशाली और रहस्यमय होती   छुपी रहती हैं। सोइ रहती हैं। इस बात का अहसास बार बार महसूस भी हुआ करता है पर फिर भी अधिकतर लोग इस शक्ति से अभिन्न और अनजान से रह जाते हैं।  मन में गम या उदासी वाली कोई ऐसी बात उठती कि तन थक हार कर बैठ जाता। या फिर उदास करने वाला कुछ ऐसा विचार उठता कि निरशा का अंधेरा छाने लगता। कई बार ऐसा भी लगता कि सिर में दर्द सा उठने लगा है।  या फिर कोई और जिस्मानी समस्या खड़ी हो जाती। लगातार बारीकी से नोट किया तो तन के ये सभी झमेले मन की दुनिया से आए हुए लगते थे। चिंता भी हुई दवाओं पर भी सोचा लेकिन किसी सन्यासी मित्र से बात करना उचित लगा।  

उन्होंने कहा कि समस्या का स्रोत तो तुमने पकड़ लिया लेकिन आगे बढना भूल रहे हो। मैं समझ नहीं पाया तो उन्होंने कहा  जहां समस्या का स्रोत है वहीं पर ध्यान केन्द्रित करो। जैसे मन का असर तन पर पड़ता है उसी तरह तन का असर मन पर भी पड़ता है। उन्होंने मुझे कुछ मुद्राएँ और आसन भी बताए और खानपान का मार्गदर्शन भी किया। 

उनकी सलाह के मुताबिक साधक और जिज्ञासु ने हर रोज़ सुबह सुबह की शुद्ध हवा में प्राणायाम और कपालभाति करना शुरू किया। शुरुआत तो ज्यादा से ज़्यादा दस मिनट तक के समय से की गई थी लेकिन कुछ ही दिनों में यह समय बढ़ता  बढ़ता डेढ़ घंटे तक पहुंच गया। 

चेहरे पर रौनक और चमक भी बढ़ने लगी। आंखों के नीचे बने हुए काले से घेरे समाप्त होने लगे। दिन के समय सफ़र और काम के दौरान बार बार नींद का योर कम होने लगा और बिलकुल समाप्त भी गया। रात को नींद बड़े अनुशं से आनी शुरू हो गई। रत भर आराम की नींद का आनंदलेने के बाद सुबह सुबह साढ़े चार बजे बिना किसी अलार्म के नींद भी खुलने लगी। उठते समय ताज़गी का अहसास बढ़ने लगा। थकावट खत्म हो गई थी कब्ज़ की समस्या भी दूर होने लगी। इन रंगों का अब हर रॉय मिलने वाले भी नोटिस लेने लगे। 

बस इसी सादगी भरे प्रयोग से पता चला कि तन-मन और अंतरात्मा कितने अदृश्य धागे से बंधे होते हैं आपस में। कितनी मज़बूती के साथ है यह तारतम्य। अब इसे कोई सूक्ष्म शरीर कह ले या कुछ और लेकिन तन-मन और अंतरात्मा में कोई राबता तो जरुर है। 

इसके इलावा भी मन के रंग को तन और माहौल से प्रभावित करने में कई कारक होते हैं। यहां कुछ मुख्य कारक दिए गए हैं। समय और जगह की कमी के कारण संक्षिप्त चर्चा  ही रहेगी क्यूंकि इन सभी मुद्दों पर अलग से किताब भी बन सकती है। मन के रंग बहुत गहरे होते हैं और  मन की शक्ति का स्रोत भी होते हैं। 

इसी तरह अहमियत तो तन की भी कम नहीं होती है। तन पर भी बारीकी से सतर्क नज़र रखनी ही उचित रहती है। तन मन की इस दुनिया के अनुभवी लोगों के लोगों के अनुभव बताते हैं आपका शारीरिक स्वास्थ्य मन के रंग को प्रभावित करता है। योग, ध्यान, नियमित व्यायाम, और स्वस्थ आहार आपके मन को शांति, सकारात्मकता, और संतुलन प्रदान कर सकते हैं।

अधिकतम विश्राम और नींद के लिए भी ध्यान देना महत्वपूर्ण है। नींद की कमी मन को अधिक चिंतित और थका दिखा सकती है। लेकिन नींद की अधिकतता भी समस्या खड़ी कर सकती है। संतुलित सोना ही उचित रहता है। संतुलित भोजन और संतुलित व्यायाम आवश्यक होते हैं। 

शारीरिक रंगों और तरंगों का भी बहुत महत्व होता है। इनमें भी अपने मन और दूसरों के मन को प्रभावित करने की क्षमता होती है। उत्तेजित करने वाले रंगों का उपयोग करना मन को जागरूक कर सकता है, जबकि शांति और शांति के लिए हलके और शांत रंगों का उपयोग किया जा सकता है।

माहौल भी इस संबंध में असर डालता है। माहौल से मन के मूड में तब्दीली आती है। मन अधिक उत्साह में भी आ सकता है और निराशा में भी जा सकता है। इसमें शक्तियां जाग सकती हैं। इसीलिए साधना के लिए आवश्यक माहौल ढूंढ़ना या बनाना पड़ता है। 

आपके आसपास का माहौल मन के रंग को सीधे प्रभावित करता है। सकारात्मक और  सच्चे सहयोगी लोग, सुरक्षित और स्वागतमयी माहौल, और उत्सवी और प्रेरणादायक स्थितियाँ मन को उत्साहित कर सकती हैं। मन की रचनात्मकता बढ़ जाती है। 

विनाशकारी और नकारात्मक माहौल, तनाव, असुरक्षित स्थितियाँ, और नकारात्मक व्यक्तियों का सामना करने पर मन को परेशान और अस्वस्थ महसूस हो सकता है। इस माहौल का बहुत बुरा असर पढता है। इससे बचना ही उचित होता है। 

भवनों, कार्यालयों, और आवास की वातावरण का भी महत्व होता है। प्राकृतिक प्रकाश, हवा, और स्थिति की सफलता और संजीदगी आपके मन के रंग को प्रभावित कर सकती है।

मन के रंग को प्रभावित करने का यह प्रकार शारीरिक और मानसिक स्तर पर एक संतुलित जीवन जीने के माध्यम से किया जा सकता है। ध्यान देने योग्य माहौल, स्वस्थ आहार, और सकारात्मक विचार योग्य तरीके हैं जिनसे आप अपने मन के रंग को सुन्दर और सकारात्मक बना सकते हैं।

Sunday, May 19, 2024

कितने अजीब हैं हम//रेक्टर कथूरिया

इस जीवन चक्र में भी हम कविता ढूंढ़ने के प्रयास में रहते हैं!


सचमुच ज़िंदगी टुकड़ों में ही तो मिलती है--  

कहीं कम तो कहीं ज़्यादा मिलती है--

बालपन मिलता है और छूट जाता है--

या फिर छिन जाता है!

फिर यौवन आता है और वो भी छूट जाता है 

या फिर छिन जाता है..!

फिर बुढ़ापा आता है 

और वो भी छिन जाता है या छूट जाता है!

बहुत से सवाल हमारे ज़हन में भी आते हैं

फिर जवाब भी आते हैं---

कि यह सब तो महात्मा बुद्ध ने भी सोचा था---!

हम क्या ज़्यादा समझदार बन गए हैं?

हम भी वही कुछ सोचने लगे हैं!

फिर कोई खूबसूरत सुजाता भी सामने आती है--

खीर से भरा बर्तन भी लाती है---!

बरसों से सूखे तन को अमृत बूंदों से कुछ ताकत मिलती है!

अमृत ज्ञान की बरसात हुई लगती है!

फिर एक बेख्याली भी आती है!

उसी बेख्याली में जो कई ख्याल एक साथ आते हैं--

उनमें से एक ख्याल यशोधरा  का भी तो होता है!

जिसे ज्ञान प्राप्ति के चक्करों में 

अकेले सोती हुई छोड़ दिया था--

पलायन सिर्फ गौतम ने तो नहीं किया था..!

हम में से बहुत से लोग अब भी वही कर रहे हैं!

फिर राहुल की भी याद आती है--

उस बच्चे ने क्या बिगाड़ा था 

उसे बालपन में ही छोड़ दिया और भाग लिए ज्ञान के पीछे ..!

अतीत बहुत से सवाल पूछने लगा है--!

भविष्य अँधियारा सा लगने लगा है!

अब शब्द बहक भी जाएँ तो भी क्या होना है--!

अब कोई ख्याल महक भी जाए तो भी क्या होना है!

चिंताएं कल भी थीं-- 

चिंताएं आज भी हैं!

सवालों के अंबार पहले भी--आज भी हैं!

जवाब कब मिलेंगे.....?

       --रेक्टर कथूरिया 

Friday, August 26, 2022

पत्रकार सतीश कत्याल ढूंढ कर लाए ज़िंदगी की मार्मिक कहानी

Friday 26th August 2022 at 07:14 PM 

 सब कुछ एक रोचक कहानी के रूप में 

संकेतक फोटो Pexels-Photo by Cottonbro

लुधियाना
: 26 अगस्त 2022: (मन के रंग डेस्क):: 

जानीमानी शख्सियत राकेश भारती मित्तल के साथ
पत्रकार सतीश कत्याल
 
पत्रकार सतीश कत्याल से मुझे हमेशां एक शिकायत रही कि आपको पत्रकार नहीं लेखक या शायर होना चाहिए था। आप हर बात को दिल पर ले लेते हैं इस तरह पत्रकारिता थोड़े होगी? जबकि मेरा अपना स्वभाव भी इसी तरह का था। मुझे खुद भी लगता अच्छाई भली शायरी और कहानी छोड़ कर इस तरफ क्यूं आ गया? शायद यही होती है किस्मत। यही होती है कर्मों के फल की कहानी। हम लोगों ने ओंड़गी के बहुत से साल खबरों की दुनिया के नाम कर दिए। रात रात भर कभी सिविल अस्पताल, कभी थाने और कभी घटनास्थल। आधी रात के बाद  घर पहुंचना। डिनर कर लिए तो कर लिए नहीं किया तो नहीं भी किया। बस आते सार खबर लिखनी, फैक्स करनी तब कहीं चाय पानी की बात सोचना और फिर अपने अपने घर सो जाना। अब फिर दोनों की संतान पत्रकारिता में है। बहुत कुछ यद् आता है तो आज भी सारा ध्यान अतीत में चला जाता है। आज सतीश कत्याल साहिब ने एक पोस्ट भेजी.शीर्षक है एक रोचक कहानी।  पता नहीं पहले कहीं  छपी भी हो। इसका मूल लेखक कौन है यह भी नहीं मालुम लेकिन इसे जितना पढ़ा जाए उतना ही कम है। हमारी ज़िंदगी की बहुत अहम बात बताती है यह कहानी। 

कहानी है स्कूल के चार करीबी दोस्तों की आंखें नम करने वाली कहानी है। जिन्होंने एक ही स्कूल में कक्षा बारवीं तक पढ़ाई की है। हम भी शायद चार या ज़्यादा थे। दिन रात एक साथ रहने वाले मित्रों की मंडली। याद करें तो बहुत सी बातें याद आती हैं। मैं चाय बहुत पीत था और कत्याल साहिब सिगरेट बहुत पीते थे लेकिन अब तो हाथ भी नहीं लगाते। उस समय शहर में इकलौता लग्ज़री होटल भी था। खान पान के मामले में उस समय का केंद्रीय स्थान कहा जा सकता है। 

अब लौटते हैं चार मित्रों की बात पर। कक्षा बारवीं की परीक्षा के बाद इन चारो मित्रों ने तय किया कि हमें उस होटल में जाकर चाय-नाश्ता करना चाहिए। हर साधारण इंसान के बस में नहीं था वहां जाना। महंगा भी तो था। उन चारों ने मुश्किल से चालीस रुपये जमा किए, रविवार का दिन था, और साढ़े दस बजे वे चारों अपने अपने साईकल से उस होटल में पहुंचे। 

चारो मित्र सीताराम, जयराम, रामचन्द्र और रविशरण चाय-नाश्ता करते हुए बातें करने लगे। ज़िंदगी का एक अहम पड़ाव पूरा हो ग़ज़ा था। नया अध्याय शुरू होने को थे। नै मंज़िलें और नए रास्ते सामने आने वाले थे। उन चारों ने सर्वसम्मति से फैसला किया कि 40 साल बाद हम पहली अप्रैल को इस होटल में फिर मिलेंगे। उस समय के वायदे और संकल्प इत्यादि इसी ढंग तरीके के हुआ करते थे। चालीस साल बाद मिलने का वायदा हुआ। सोचने लगे तब तक हम सब को बहुत मेहनत करनी चाहिए, यह देखना दिलचस्प होगा कि किसकी कितनी प्रगति होती है। कौन इस सफर  पहुंचता है। किस्मत किस पर मेहरबान होती है और लक्ष्मी किस पर कृपा करती है। चालीस साल बाद मिलने का वायड हुआ तो साथ ही यह भी तय हुआ कि जो दोस्त उस दिन बाद में होटल आएगा उसे उस समय का होटल का बिल देना होगा। उनदिनों  भी लेट आने का सही जुरमाना कुछ इसी तरह का ही हुआ करता था। 

उनको चाय नाश्ता परोसने वाला वेटर कालू भी यह सब सुन रहा था, उसने कहा कि अगर मैं यहाँ रहा, तो मैं इस होटल में आप सब का इंतज़ार करूँगा। इस तरह वह भी इस मित्रमंडली में शामिल भी हुआ और गवाह भी रहा। संखजा अब चार से पांच हो गई थी। इस तरह इस मुलाकात के बाद आगे की शिक्षा के लिए चारों मित्र गले किले और अलग- अलग हो गए।

सीताराम शहर छोड़कर आगे की पढ़ाई के लिए अपने फूफ़ा के पास चला गया था, जयराम आगे की पढ़ाई के लिए अपने चाचा के पास चला गया, रामचन्द्र और रविशरण को शहर के अलग-अलग कॉलेजों में दाखिला मिला। चारों के रास्ते अलग हो गए थे। चारों को मंज़िलों की तलाश थी। अजीब बात कि आम तौर पर हर दौर में में जीवन की सफलता ही बहुत से लोगों की मंज़िल रही। फिर उनके बच्चों की--फिर उनके बच्चों की। जीवन की अंतर्यात्रा पर तो गौतम बुद्ध और ओशो जैसे  बहुत काम लोग ही निकल सके। अंतर्यात्रा पर निकलने वालों को आम तौर पर दुनिया असफल इंसान समझ लेती है क्यूंकि पैसा उनकी मंज़िल ही नहीं रहता। पद और शोहरत को वे लोग समझते ही।  पर सफलता का पैमाना वही सफलता है जिस की तलाश इन चारो मित्रों को भी थी।  

आखिरकार रामचन्द्र भी शहर छोड़कर चला गया। दिन, महीने, साल बीत गए। वक्त पंख लगा कर उड़ता चला गया। इलाकों, इमारतों और रास्तों के रंग रूप ही बदल गए। इन 40 वर्षों में उस शहर में आमूल-चूल परिवर्तन आया, शहर की आबादी बढ़ी, सड़कों, फ्लाईओवर ने महानगरों की सूरत बदल दी। शहर की पहचान ही कहां  आती थी। शहर की वो चालीस साल पहले वाली सादगी अब लुप्त हो चुकी थी। जिस होटल प् मिलना था अब वह होटल भी स्टार होटल बन गया था, वेटर कालू अब कालू सेठ बन गया और साथ ही इस होटल का मालिक भी बन गया था।

एक लम्बा अरसा गुज़र चूका था। चार दश्क अर्थात 40 साल बाद, निर्धारित तिथि, पहली अप्रैल भी आ गई। दोपहर में, एक लग्जरी कार होटल के दरवाजे पर आई। सीताराम कार से उतरा और पोर्च की ओर चलने लगा, सीताराम के पास अब तीन ज्वैलरी शो रूम हो चुके थे। उसने बहुत पैसा कमा लिया था। 

सीताराम होटल के मालिक कालू सेठ के पासपहुंचा, दोनों एक दूसरे को देखते रहे। भीगी आंखों में ख़ुशी भी थी। कालू सेठ ने कहा कि रविशरण सर ने आपके लिए एक महीने पहले एक टेबल बुक किया था। सो आप आइए। आपका स्वागत है। 

सीताराम मन ही मन खुश था कि वह चारों में से पहला था, इसलिए उसे आज का बिल नहीं देना पड़ेगा, और वह सबसे पहले आने के लिए अपने दोस्तों का मज़ाक उड़ाएगा।

एक घंटे में जयराम भी आ गया, जयराम भी तरक्की कर के शहर का बड़ा राजनेता व बिजनेस मैन बन गया था। उसका छ ख़ासा नाम था पूरे इलाके में। उसकी तूती बोलती थी। 

अब दोनों बातें कर रहे थे और दूसरे मित्रों का इंतज़ार कर रहे थे, तीसरा मित्र रामचन्द्र आधे घंटे में आ गया।

उससे बात करने पर दोनों को पता चला कि रामचन्द्र भी अब बहुत बड़ा बिज़नेसमैन बन गया है।

तीनों मित्रों की आंखें  बार-बार दरवाजे पर जा रही थीं, रविशरण कब आएगा ?

इतनी देर में कालू सेठ ने कहा कि रविशरण सर की ओर से एक मैसेज आया है, तुम लोग चाय-नाश्ता शुरू करो, मैं आ रहा हूँ।

तीनों 40 साल बाद एक-दूसरे से मिलकर खुश थे।

घंटों तक मजाक चलता रहा, लेकिन रविशरण नहीं आया।

कालू सेठ ने कहा कि फिर से रविशरण सर का मैसेज आया है, आप तीनों अपना मनपसंद मेन्यू चुनकर खाना शुरू करें।

खाना खा लिया तो भी रविशरण नहीं दिखा, बिल मांगते ही तीनों को जवाब मिला कि ऑनलाइन सिस्टम से बिल का भुगतान भी हो गया है।

शाम के आठ बजे एक युवक कार से उतरा और भारी मन से निकलने की तैयारी कर रहे तीनों मित्रों के पास पहुंचा, तीनों उस आदमी को देखते ही रह गए।

युवक कहने लगा, मैं आपके दोस्त का बेटा यशवर्धन हूँ, मेरे पिता का नाम रविशरण  है।

पिताजी ने मुझे आज आपके आने के बारे में बताया था, उन्हें इस दिन का इंतजार था, लेकिन पिछले महीने एक गंभीर बीमारी के कारण उनका निधन हो गया।

उन्होंने मुझे देर से मिलने के लिए कहा था, अगर मैं जल्दी निकल गया, तो वे दुखी होंगे, क्योंकि मेरे दोस्त तब नहीं हँसेंगे, जब उन्हें पता चलेगा कि मैं इस दुनिया में नहीं हूँ, तो वे एक-दूसरे से मिलने की खुशी खो देंगे।

इसलिए उन्होंने मुझे देर से जाने का आदेश दिया था।

उन्होंने मुझे उनकी ओर से आपको गले लगाने के लिए भी कहा था, यशवर्धन ने अपने दोनों हाथ फैला दिए।

आसपास के लोग उत्सुकता से इस दृश्य को देख रहे थे, उन्हें लगा कि उन्होंने इस युवक को कहीं देखा है।

यशवर्धन ने कहा कि मेरे पिता शिक्षक बने, और मुझे पढ़ाकर कलेक्टर बनाया, आज मैं इस शहर का कलेक्टर हूँ।

सब चकित थे, कालू सेठ ने कहा कि अब 40 साल बाद नहीं, बल्कि हर 40 दिन में हम अपने होटल में बार-बार मिलेंगे, और हर बार मेरी तरफ से एक भव्य पार्टी होगी।

अपने दोस्त-मित्रों व सगे-सम्बन्धियों से मिलते रहो, अपनों से मिलने के लिए बरसों का इंतज़ार मत करो, जाने कब किसकी बिछड़ने की बारी आ जाए और हमें पता ही न चले।

शायद यही हाल हमारा भी है। हम अपने कुछ दोस्तों को सलाम दुआ मुबारक बाद आदि का मैसेज भेज कर ज़िंदा रहने का प्रमाण देते हैं।

ज़िंदगी भी ट्रेन की तरह है जिसका जब स्टेशन आयेगा, उतर जायेगा। रह जाती हैं सिर्फ धुंधली सी यादें।

परिवार के साथ रहें, ज़िन्दा होने की खुशी महसूस करें..

सिर्फ ईद दीपावली के दिन ही नहीं अन्य सभी अवसरों तथा दिन प्रतिदिन मिलने पर भी गले लगाया करें।  

मित्र सतीश कत्याल की तरफ से भेजी गई यह कहाँ केवल उन चार मित्रों की नहीं हमारी भी है। हम एक ही शहर में रहते हुए भी कहां मिल पाते हैं एक दुसरे से। ऐसी तरक्की और ऐसी कमाई भी किस काम की जो अपनों से ही दूर कर दे। क्या सचमुच महंगाई और अन्य झमेलों ने हमें एक दुसरे से मिलने में  रुकावटें खड़ी कर दी हैं? आइए धर्म, जाती, पार्टी और सियासत को एक तरफ रखते हुए एक दुसरे से मिले करें जैसे शुर शुर में मिला करते थे। -रेक्टर कथूरिया 

Thursday, June 30, 2022

’हौसलों के पंख’ से भी उड़ सकता है इंसान,

30th June 2022 at 05:29 PM

100 प्रतिशत अंक अर्जित कर रवि मीना ने कर दिखाया कमाल 


ज़िला दौसा
//जयपुर: 30 जून 2022: (मन के रंग//राजस्थान स्क्रीन)::

आज का ज़िला दौसा कभी जयपुर का ही हिस्सा हुआ करता था। इसलिए बहुत से लोग इसे आज भी जयपुर ही समझते हैं। दौसा क्षेत्र में कछवाहा राज्य के संस्थापक दूल्हेराय ने लगभग 1137 ईस्वी में बड़गूजरों को हराकर अपना शासन स्थापित किया था। इसे ज़हन के इतिहास में विशेष स्थान हासिल रहा है। इसे ढूंढाड़ अंचल के कछवाहा वंश की प्रथम राजधानी भी बनाया गया था। इसकी भी कई बातें प्रचलित रही हैं। दौसा जिले को जयपुर से पृथक कर 10 अप्रैल 1991 को नया जिला बनाया गया। प्रारंभ में दौसा जिला राजस्थान का क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे छोटा जिला (क्षेत्रफल 2950 वर्ग किलोमीटर) था, लेकिन सवाईमाधोपुर की महुआ तहसील को 15 अगस्त 1992 को दौसा जिले में सम्मिलित किया गया जिससे इसका क्षेत्रफल बढ़कर 3432 वर्ग किलोमीटर हो गया और यह धौलपुर के बाद दूसरे नंबर का सबसे छोटा जिला बन गया। दौसा नगर देवगिरी पहाड़ी की तलहटी में बसा हुआ है तथा यह राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 11 पर स्थित है। तब से ले कर आज तक दौसा अपने बडप्प्पन के मील पत्थर गाड़ता ही चला आ रहा है। इसी दौसा से सबंधित हैं रवि जिसने साबित किया पंख होने से कुछ नहीं होता हौंसलों से उड़ान होती है। 

प्रदेश में 12 वीं के घोषित परिणाम में दिव्यांग बालको के उच्च माध्यमिक बोर्ड परीक्षा 2022 के परिणाम में दौसा जिले के एक दिव्यांग विद्यार्थी ने ’100 प्रतिशत’अंक लाकर साबित कर दिया कि दौड़ने के लिए पैरो की जरूरत नही होती, ’हौसलों के पंख’से भी इंसान उड़ सकता है।
 
बचपन से दोनों पैरों से दिव्यांग रवि ने घोषित दिव्यांग बालकों के माध्यमिक बोर्ड परीक्षा 2022 के रिजल्ट में 100ः अंक प्राप्त कर साबित कर दिया कि दौड़ने के लिए पैरों की नहीं बल्कि मजबूत हौसले की आवश्यकता होती हैं । हौसले के पंख से भी इंसान सफलता रूपी उड़ान भर सकता है। यदि दिल में कुछ करने की तम्मन्ना हो तथा हौसले बुलंद हैं तो कोई भी समस्या आपको रोक नहीं सकती है। ऎसा ही कर दिखाया रवि कुमार मीणा ने। 80 प्रतिशत दिव्यांग बालक ने घोषित दिव्यांग बालको के उच्च माध्यमिक बोर्ड परीक्षा 2022 के परिणाम में ’100 प्रतिशत’ अंक लाकर साबित कर दिया कि दौड़ने के लिए पैरो की जरूरत नही होती। ’हौसलों के पंख’ से भी इंसाल उड़ सकता है। छात्र रवि कुमार मीणा पुत्र श्री फैलीराम मीणा, राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय गन्डरावा दौसा को होम बेस्ड शिक्षा से सत्र 2009-10 में जोड़ा गया था। छात्र पैरो से चलने में पूरी तरह असमर्थ है।

लेकिन कहते है न कि हिम्मते मर्दा मददे खुदा, एकबार राह दिखाने के बाद रवि कुमार ने पीछे मुड़कर नही देखा और 12 वीं के घोषित परीक्षा परिणाम में छात्र ने राजस्थान में सर्वाधिक अंक प्राप्त करने वालो में शुमार है। कक्षा 10 में 86 प्रतिशत अंको के बाद इस वर्ष कक्षा 12 में 100 प्रतिशत अंक अर्जित कर कीर्तिमान स्थापित कर दिया है। माध्यमिक बोर्ड परीक्षा 2022 में निजी विद्यलय के छात्र गिरीश शर्मा के सर्वोच्च अंक प्राप्त करने के बाद ’दौसा के गौरव में रवि मीणा’ ने चार चांद लगा दिये है।

समसा द्वारा छात्र को समय समय पर प्रोत्साहित किया गया एवं ट्रायसाइकिल, परिवहन भत्ता और एस्कार्ट भत्ता भी प्रदान किया गया। छात्र के पिता कृषि व मां गृहणी का कार्य करते है। ग्रामवासियों, विद्यालय के स्टाफ एवं आमजन ने छात्र रवि कुमार के उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हुए बधाई दी। जिला शिक्षा कार्यालय की ओर से छात्र रवि उसके माता-पिता, विद्यालय के प्रधानाचार्य सहित समस्त स्टाफ को बहुत बहुत बधाई दी गई।

विशेष योग्यजन आयोग के राज्य आयुक्त उमाशंकर शर्मा स्वंय दौसा जिले के सिकराय उपखंड के ग्राम पंचायत गंडरावा पहुंचकर रवि कुमार मीना को बधाई दी एवं माला पहनाकर हौसला अफजाई की। राज्य आयुक्त ने रवि की हौसला अफजाई करते हुए आगे बढ़ने के लिए निरंतर प्रयासरत रहने की बात कही तथा रवि के माता-पिता को बधाई दी इस अवसर पर ग्राम पंचायत गंडरावा के गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।

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- रामजी लाल मीना
सहायक निदेशक, दौसा

Friday, April 19, 2013

पीरखाना, बंटी बाबा और करिश्में

एक ऐसा स्थान जहाँ मन भी बदलते हैं और जिंदगी के रंग ढंग भी
लुधियाना की काकोवाल रोड पर स्थित न्यू अग्रवाल पीरखाना एक ऐसा धार्मिक स्थान है जहाँ लोगों के मन बदल दिए जाते हैं। यह सत्य कथा है लुधियाना के ही एक ऐसे व्यक्ति की जो एक ऐसे महत्वपूर्ण सरकारी विभाग की जहाँ वह बहुत ही ख़ास पद पर नियुक्त था। लम्बी नौकरी के बाद आखिर एक दिन रिटायर होने का वक्त भी आ गया। रिटायर होने पर कई किस्म की परेशानियाँ भी आकर घेरने लगीं। बहुत हाथ पाँव मारे लेकिन उलझनें थीं कि कम होने का नाम ही नहीं ले रहीं थीं। एक दिन मित्र के कहने पर पीरखाना पर जा कर सजदा किया। वहां मुलाकात हुई इस दरबार के प्रमुख बंटी बाबा के साथ। वहां बैठते ही बंटी बाबा ने उसकी तरफ देखा और खुद अवाज़ देकर उसे अपने पास बुलाया। साफ़ और सीधे शब्दों में पूछा--क्या यही समस्या है---इसी काम से यहाँ आये हो---? दरबार में पहुंचा व्यक्ति हैरान कि सारी बात यहाँ कैसे मालूम-----लेकिन जवाब तो देना ही था---हाँ की मुद्रा में सर हिल दिया। बाबा ने अगला सवाल पुछा-क्या शराब पीते हो---? जवाब में कहा नहीं----अगला सवाल था क्या बेटा शराब पीता है---? जवाब फिर इनकार में ही था। बाबा ने दो पल के लिए आंख बंद की---सिगरेट से एक सूटा लगाया---और डांट भरी नाराज़ नजर से देखते हुए कहने लगे जब तू भी नहीं पीता--तेरा बीटा भी नहीं पीता तो फिर तेरे घर के अमुक कमरे की अमुक अलमारी में शराब की इतनी बोतलें क्या कर रहीं हैं ? रिटायर्ड अधिकारी की नजरें झुक गयीं---सफाई देते हुए बोला---जी मेहमानों और दोस्तों के लिए रखीं हैं---बंटी बाबा एक बार फिर उसे डांटते हुए बोले मैं यहाँ लोगों की शराब छुड्वाता हूँ और तुम लोगों को पिलाते हो----बांटते हो ?? ऐसा चलेगा तो तेरा काम नहीं हो सकता---! डांट सुन कर  व्यक्ति डर गया--बोला बाबा ऐसा न कहिये---तो बाबा फिर उसकी तरफ देख कर बोले की जा और उन बोतलों को तोड़ कर आ---वह व्यक्ति गया और महंगी शराब की 18 बोतलें उसी रात को तोड़ दीं--....आज वह बहुत ही सुखी व्यक्ति है---बदल गए न मन के रंग--और साथ ही जिंदगी के ढंग---! -आर के तारेश 

Sunday, July 1, 2012

Colors of life..प्यार का पिंजरा

                                                                                                                 साभार चित्र 

जब प्यार हुआ इस पिंजरे से;
 तुम कहने लगे आज़ाद रहो।..  ___A choice by Jasmine