Friday, August 26, 2022

पत्रकार सतीश कत्याल ढूंढ कर लाए ज़िंदगी की मार्मिक कहानी

Friday 26th August 2022 at 07:14 PM 

 सब कुछ एक रोचक कहानी के रूप में 

संकेतक फोटो Pexels-Photo by Cottonbro

लुधियाना
: 26 अगस्त 2022: (मन के रंग डेस्क):: 

जानीमानी शख्सियत राकेश भारती मित्तल के साथ
पत्रकार सतीश कत्याल
 
पत्रकार सतीश कत्याल से मुझे हमेशां एक शिकायत रही कि आपको पत्रकार नहीं लेखक या शायर होना चाहिए था। आप हर बात को दिल पर ले लेते हैं इस तरह पत्रकारिता थोड़े होगी? जबकि मेरा अपना स्वभाव भी इसी तरह का था। मुझे खुद भी लगता अच्छाई भली शायरी और कहानी छोड़ कर इस तरफ क्यूं आ गया? शायद यही होती है किस्मत। यही होती है कर्मों के फल की कहानी। हम लोगों ने ओंड़गी के बहुत से साल खबरों की दुनिया के नाम कर दिए। रात रात भर कभी सिविल अस्पताल, कभी थाने और कभी घटनास्थल। आधी रात के बाद  घर पहुंचना। डिनर कर लिए तो कर लिए नहीं किया तो नहीं भी किया। बस आते सार खबर लिखनी, फैक्स करनी तब कहीं चाय पानी की बात सोचना और फिर अपने अपने घर सो जाना। अब फिर दोनों की संतान पत्रकारिता में है। बहुत कुछ यद् आता है तो आज भी सारा ध्यान अतीत में चला जाता है। आज सतीश कत्याल साहिब ने एक पोस्ट भेजी.शीर्षक है एक रोचक कहानी।  पता नहीं पहले कहीं  छपी भी हो। इसका मूल लेखक कौन है यह भी नहीं मालुम लेकिन इसे जितना पढ़ा जाए उतना ही कम है। हमारी ज़िंदगी की बहुत अहम बात बताती है यह कहानी। 

कहानी है स्कूल के चार करीबी दोस्तों की आंखें नम करने वाली कहानी है। जिन्होंने एक ही स्कूल में कक्षा बारवीं तक पढ़ाई की है। हम भी शायद चार या ज़्यादा थे। दिन रात एक साथ रहने वाले मित्रों की मंडली। याद करें तो बहुत सी बातें याद आती हैं। मैं चाय बहुत पीत था और कत्याल साहिब सिगरेट बहुत पीते थे लेकिन अब तो हाथ भी नहीं लगाते। उस समय शहर में इकलौता लग्ज़री होटल भी था। खान पान के मामले में उस समय का केंद्रीय स्थान कहा जा सकता है। 

अब लौटते हैं चार मित्रों की बात पर। कक्षा बारवीं की परीक्षा के बाद इन चारो मित्रों ने तय किया कि हमें उस होटल में जाकर चाय-नाश्ता करना चाहिए। हर साधारण इंसान के बस में नहीं था वहां जाना। महंगा भी तो था। उन चारों ने मुश्किल से चालीस रुपये जमा किए, रविवार का दिन था, और साढ़े दस बजे वे चारों अपने अपने साईकल से उस होटल में पहुंचे। 

चारो मित्र सीताराम, जयराम, रामचन्द्र और रविशरण चाय-नाश्ता करते हुए बातें करने लगे। ज़िंदगी का एक अहम पड़ाव पूरा हो ग़ज़ा था। नया अध्याय शुरू होने को थे। नै मंज़िलें और नए रास्ते सामने आने वाले थे। उन चारों ने सर्वसम्मति से फैसला किया कि 40 साल बाद हम पहली अप्रैल को इस होटल में फिर मिलेंगे। उस समय के वायदे और संकल्प इत्यादि इसी ढंग तरीके के हुआ करते थे। चालीस साल बाद मिलने का वायदा हुआ। सोचने लगे तब तक हम सब को बहुत मेहनत करनी चाहिए, यह देखना दिलचस्प होगा कि किसकी कितनी प्रगति होती है। कौन इस सफर  पहुंचता है। किस्मत किस पर मेहरबान होती है और लक्ष्मी किस पर कृपा करती है। चालीस साल बाद मिलने का वायड हुआ तो साथ ही यह भी तय हुआ कि जो दोस्त उस दिन बाद में होटल आएगा उसे उस समय का होटल का बिल देना होगा। उनदिनों  भी लेट आने का सही जुरमाना कुछ इसी तरह का ही हुआ करता था। 

उनको चाय नाश्ता परोसने वाला वेटर कालू भी यह सब सुन रहा था, उसने कहा कि अगर मैं यहाँ रहा, तो मैं इस होटल में आप सब का इंतज़ार करूँगा। इस तरह वह भी इस मित्रमंडली में शामिल भी हुआ और गवाह भी रहा। संखजा अब चार से पांच हो गई थी। इस तरह इस मुलाकात के बाद आगे की शिक्षा के लिए चारों मित्र गले किले और अलग- अलग हो गए।

सीताराम शहर छोड़कर आगे की पढ़ाई के लिए अपने फूफ़ा के पास चला गया था, जयराम आगे की पढ़ाई के लिए अपने चाचा के पास चला गया, रामचन्द्र और रविशरण को शहर के अलग-अलग कॉलेजों में दाखिला मिला। चारों के रास्ते अलग हो गए थे। चारों को मंज़िलों की तलाश थी। अजीब बात कि आम तौर पर हर दौर में में जीवन की सफलता ही बहुत से लोगों की मंज़िल रही। फिर उनके बच्चों की--फिर उनके बच्चों की। जीवन की अंतर्यात्रा पर तो गौतम बुद्ध और ओशो जैसे  बहुत काम लोग ही निकल सके। अंतर्यात्रा पर निकलने वालों को आम तौर पर दुनिया असफल इंसान समझ लेती है क्यूंकि पैसा उनकी मंज़िल ही नहीं रहता। पद और शोहरत को वे लोग समझते ही।  पर सफलता का पैमाना वही सफलता है जिस की तलाश इन चारो मित्रों को भी थी।  

आखिरकार रामचन्द्र भी शहर छोड़कर चला गया। दिन, महीने, साल बीत गए। वक्त पंख लगा कर उड़ता चला गया। इलाकों, इमारतों और रास्तों के रंग रूप ही बदल गए। इन 40 वर्षों में उस शहर में आमूल-चूल परिवर्तन आया, शहर की आबादी बढ़ी, सड़कों, फ्लाईओवर ने महानगरों की सूरत बदल दी। शहर की पहचान ही कहां  आती थी। शहर की वो चालीस साल पहले वाली सादगी अब लुप्त हो चुकी थी। जिस होटल प् मिलना था अब वह होटल भी स्टार होटल बन गया था, वेटर कालू अब कालू सेठ बन गया और साथ ही इस होटल का मालिक भी बन गया था।

एक लम्बा अरसा गुज़र चूका था। चार दश्क अर्थात 40 साल बाद, निर्धारित तिथि, पहली अप्रैल भी आ गई। दोपहर में, एक लग्जरी कार होटल के दरवाजे पर आई। सीताराम कार से उतरा और पोर्च की ओर चलने लगा, सीताराम के पास अब तीन ज्वैलरी शो रूम हो चुके थे। उसने बहुत पैसा कमा लिया था। 

सीताराम होटल के मालिक कालू सेठ के पासपहुंचा, दोनों एक दूसरे को देखते रहे। भीगी आंखों में ख़ुशी भी थी। कालू सेठ ने कहा कि रविशरण सर ने आपके लिए एक महीने पहले एक टेबल बुक किया था। सो आप आइए। आपका स्वागत है। 

सीताराम मन ही मन खुश था कि वह चारों में से पहला था, इसलिए उसे आज का बिल नहीं देना पड़ेगा, और वह सबसे पहले आने के लिए अपने दोस्तों का मज़ाक उड़ाएगा।

एक घंटे में जयराम भी आ गया, जयराम भी तरक्की कर के शहर का बड़ा राजनेता व बिजनेस मैन बन गया था। उसका छ ख़ासा नाम था पूरे इलाके में। उसकी तूती बोलती थी। 

अब दोनों बातें कर रहे थे और दूसरे मित्रों का इंतज़ार कर रहे थे, तीसरा मित्र रामचन्द्र आधे घंटे में आ गया।

उससे बात करने पर दोनों को पता चला कि रामचन्द्र भी अब बहुत बड़ा बिज़नेसमैन बन गया है।

तीनों मित्रों की आंखें  बार-बार दरवाजे पर जा रही थीं, रविशरण कब आएगा ?

इतनी देर में कालू सेठ ने कहा कि रविशरण सर की ओर से एक मैसेज आया है, तुम लोग चाय-नाश्ता शुरू करो, मैं आ रहा हूँ।

तीनों 40 साल बाद एक-दूसरे से मिलकर खुश थे।

घंटों तक मजाक चलता रहा, लेकिन रविशरण नहीं आया।

कालू सेठ ने कहा कि फिर से रविशरण सर का मैसेज आया है, आप तीनों अपना मनपसंद मेन्यू चुनकर खाना शुरू करें।

खाना खा लिया तो भी रविशरण नहीं दिखा, बिल मांगते ही तीनों को जवाब मिला कि ऑनलाइन सिस्टम से बिल का भुगतान भी हो गया है।

शाम के आठ बजे एक युवक कार से उतरा और भारी मन से निकलने की तैयारी कर रहे तीनों मित्रों के पास पहुंचा, तीनों उस आदमी को देखते ही रह गए।

युवक कहने लगा, मैं आपके दोस्त का बेटा यशवर्धन हूँ, मेरे पिता का नाम रविशरण  है।

पिताजी ने मुझे आज आपके आने के बारे में बताया था, उन्हें इस दिन का इंतजार था, लेकिन पिछले महीने एक गंभीर बीमारी के कारण उनका निधन हो गया।

उन्होंने मुझे देर से मिलने के लिए कहा था, अगर मैं जल्दी निकल गया, तो वे दुखी होंगे, क्योंकि मेरे दोस्त तब नहीं हँसेंगे, जब उन्हें पता चलेगा कि मैं इस दुनिया में नहीं हूँ, तो वे एक-दूसरे से मिलने की खुशी खो देंगे।

इसलिए उन्होंने मुझे देर से जाने का आदेश दिया था।

उन्होंने मुझे उनकी ओर से आपको गले लगाने के लिए भी कहा था, यशवर्धन ने अपने दोनों हाथ फैला दिए।

आसपास के लोग उत्सुकता से इस दृश्य को देख रहे थे, उन्हें लगा कि उन्होंने इस युवक को कहीं देखा है।

यशवर्धन ने कहा कि मेरे पिता शिक्षक बने, और मुझे पढ़ाकर कलेक्टर बनाया, आज मैं इस शहर का कलेक्टर हूँ।

सब चकित थे, कालू सेठ ने कहा कि अब 40 साल बाद नहीं, बल्कि हर 40 दिन में हम अपने होटल में बार-बार मिलेंगे, और हर बार मेरी तरफ से एक भव्य पार्टी होगी।

अपने दोस्त-मित्रों व सगे-सम्बन्धियों से मिलते रहो, अपनों से मिलने के लिए बरसों का इंतज़ार मत करो, जाने कब किसकी बिछड़ने की बारी आ जाए और हमें पता ही न चले।

शायद यही हाल हमारा भी है। हम अपने कुछ दोस्तों को सलाम दुआ मुबारक बाद आदि का मैसेज भेज कर ज़िंदा रहने का प्रमाण देते हैं।

ज़िंदगी भी ट्रेन की तरह है जिसका जब स्टेशन आयेगा, उतर जायेगा। रह जाती हैं सिर्फ धुंधली सी यादें।

परिवार के साथ रहें, ज़िन्दा होने की खुशी महसूस करें..

सिर्फ ईद दीपावली के दिन ही नहीं अन्य सभी अवसरों तथा दिन प्रतिदिन मिलने पर भी गले लगाया करें।  

मित्र सतीश कत्याल की तरफ से भेजी गई यह कहाँ केवल उन चार मित्रों की नहीं हमारी भी है। हम एक ही शहर में रहते हुए भी कहां मिल पाते हैं एक दुसरे से। ऐसी तरक्की और ऐसी कमाई भी किस काम की जो अपनों से ही दूर कर दे। क्या सचमुच महंगाई और अन्य झमेलों ने हमें एक दुसरे से मिलने में  रुकावटें खड़ी कर दी हैं? आइए धर्म, जाती, पार्टी और सियासत को एक तरफ रखते हुए एक दुसरे से मिले करें जैसे शुर शुर में मिला करते थे। -रेक्टर कथूरिया 

Thursday, June 30, 2022

’हौसलों के पंख’ से भी उड़ सकता है इंसान,

30th June 2022 at 05:29 PM

100 प्रतिशत अंक अर्जित कर रवि मीना ने कर दिखाया कमाल 


ज़िला दौसा
//जयपुर: 30 जून 2022: (मन के रंग//राजस्थान स्क्रीन)::

आज का ज़िला दौसा कभी जयपुर का ही हिस्सा हुआ करता था। इसलिए बहुत से लोग इसे आज भी जयपुर ही समझते हैं। दौसा क्षेत्र में कछवाहा राज्य के संस्थापक दूल्हेराय ने लगभग 1137 ईस्वी में बड़गूजरों को हराकर अपना शासन स्थापित किया था। इसे ज़हन के इतिहास में विशेष स्थान हासिल रहा है। इसे ढूंढाड़ अंचल के कछवाहा वंश की प्रथम राजधानी भी बनाया गया था। इसकी भी कई बातें प्रचलित रही हैं। दौसा जिले को जयपुर से पृथक कर 10 अप्रैल 1991 को नया जिला बनाया गया। प्रारंभ में दौसा जिला राजस्थान का क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे छोटा जिला (क्षेत्रफल 2950 वर्ग किलोमीटर) था, लेकिन सवाईमाधोपुर की महुआ तहसील को 15 अगस्त 1992 को दौसा जिले में सम्मिलित किया गया जिससे इसका क्षेत्रफल बढ़कर 3432 वर्ग किलोमीटर हो गया और यह धौलपुर के बाद दूसरे नंबर का सबसे छोटा जिला बन गया। दौसा नगर देवगिरी पहाड़ी की तलहटी में बसा हुआ है तथा यह राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 11 पर स्थित है। तब से ले कर आज तक दौसा अपने बडप्प्पन के मील पत्थर गाड़ता ही चला आ रहा है। इसी दौसा से सबंधित हैं रवि जिसने साबित किया पंख होने से कुछ नहीं होता हौंसलों से उड़ान होती है। 

प्रदेश में 12 वीं के घोषित परिणाम में दिव्यांग बालको के उच्च माध्यमिक बोर्ड परीक्षा 2022 के परिणाम में दौसा जिले के एक दिव्यांग विद्यार्थी ने ’100 प्रतिशत’अंक लाकर साबित कर दिया कि दौड़ने के लिए पैरो की जरूरत नही होती, ’हौसलों के पंख’से भी इंसान उड़ सकता है।
 
बचपन से दोनों पैरों से दिव्यांग रवि ने घोषित दिव्यांग बालकों के माध्यमिक बोर्ड परीक्षा 2022 के रिजल्ट में 100ः अंक प्राप्त कर साबित कर दिया कि दौड़ने के लिए पैरों की नहीं बल्कि मजबूत हौसले की आवश्यकता होती हैं । हौसले के पंख से भी इंसान सफलता रूपी उड़ान भर सकता है। यदि दिल में कुछ करने की तम्मन्ना हो तथा हौसले बुलंद हैं तो कोई भी समस्या आपको रोक नहीं सकती है। ऎसा ही कर दिखाया रवि कुमार मीणा ने। 80 प्रतिशत दिव्यांग बालक ने घोषित दिव्यांग बालको के उच्च माध्यमिक बोर्ड परीक्षा 2022 के परिणाम में ’100 प्रतिशत’ अंक लाकर साबित कर दिया कि दौड़ने के लिए पैरो की जरूरत नही होती। ’हौसलों के पंख’ से भी इंसाल उड़ सकता है। छात्र रवि कुमार मीणा पुत्र श्री फैलीराम मीणा, राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय गन्डरावा दौसा को होम बेस्ड शिक्षा से सत्र 2009-10 में जोड़ा गया था। छात्र पैरो से चलने में पूरी तरह असमर्थ है।

लेकिन कहते है न कि हिम्मते मर्दा मददे खुदा, एकबार राह दिखाने के बाद रवि कुमार ने पीछे मुड़कर नही देखा और 12 वीं के घोषित परीक्षा परिणाम में छात्र ने राजस्थान में सर्वाधिक अंक प्राप्त करने वालो में शुमार है। कक्षा 10 में 86 प्रतिशत अंको के बाद इस वर्ष कक्षा 12 में 100 प्रतिशत अंक अर्जित कर कीर्तिमान स्थापित कर दिया है। माध्यमिक बोर्ड परीक्षा 2022 में निजी विद्यलय के छात्र गिरीश शर्मा के सर्वोच्च अंक प्राप्त करने के बाद ’दौसा के गौरव में रवि मीणा’ ने चार चांद लगा दिये है।

समसा द्वारा छात्र को समय समय पर प्रोत्साहित किया गया एवं ट्रायसाइकिल, परिवहन भत्ता और एस्कार्ट भत्ता भी प्रदान किया गया। छात्र के पिता कृषि व मां गृहणी का कार्य करते है। ग्रामवासियों, विद्यालय के स्टाफ एवं आमजन ने छात्र रवि कुमार के उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हुए बधाई दी। जिला शिक्षा कार्यालय की ओर से छात्र रवि उसके माता-पिता, विद्यालय के प्रधानाचार्य सहित समस्त स्टाफ को बहुत बहुत बधाई दी गई।

विशेष योग्यजन आयोग के राज्य आयुक्त उमाशंकर शर्मा स्वंय दौसा जिले के सिकराय उपखंड के ग्राम पंचायत गंडरावा पहुंचकर रवि कुमार मीना को बधाई दी एवं माला पहनाकर हौसला अफजाई की। राज्य आयुक्त ने रवि की हौसला अफजाई करते हुए आगे बढ़ने के लिए निरंतर प्रयासरत रहने की बात कही तथा रवि के माता-पिता को बधाई दी इस अवसर पर ग्राम पंचायत गंडरावा के गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।

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- रामजी लाल मीना
सहायक निदेशक, दौसा

Tuesday, February 22, 2022

तन, मन और वनस्पति के साथ समन्वय के रंगों पर विशेष

22nd February 2022 at 05:23 PM

 औषधीय पौधों के रूप में मिला जीवनदान 


जयपुर
: 22 फरवरी 2022: (मन के रंग//राजस्थान स्क्रीन)::

Pexels-Photo By Ennie Horvathy
राज्य के औषधीय पौधे गुणवत्ता एवं विविधता के लिए विश्व प्रसिद्ध हैं। कोरोना काल के दौर में इन औषधीय पौधो की महत्ता और बढ़ी है। राज्य सरकार द्वारा इसी महत्ता को समझते हुए आमजन की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने के लिए ‘घर घर औषधि योजना की शरुआत की गई। इस योजना के माध्यम से तुलसी, गिलोय, अश्वगंधा तथा कालमेघ के पौधे आमजन को वितरित किए गए।

जन स्वास्थ्य में बेहतर सुधार के लिए सरकार द्वारा औषधीय पौधों के रूप में घर-घर तक सेहत की ‘संजीवनी’ पहुंचाई गई। पूरे प्रदेश में संचालित हो रही घर-घर औषधि योजना के तहत विभाग द्वारा पहले वर्ष के पौध वितरण का लक्ष्य शत-प्रतिशत पूर्ण कर लिया गया है। इसके साथ ही सभी जिलों में आगामी वर्ष के लिए तैयारियां जारी हैं। सम्पूर्ण वन विभाग के प्रयासों की बदौलत ही प्रदेश भर में औषधीय पौधों की 63 लाख से अधिक किट्स का वितरण किया जा चुका है।

प्रदेश के आधे परिवारों तक योजना में देय चारों प्रजातियों के औषधीय पौधे पहुंचाए गए हैं। संपूर्ण वन विभाग और राज्य के सभी विभागों के प्रयासों की बदौलत पहले वर्ष का पौध वितरण लक्ष्य पूर्ण हो गया है। पहले वर्ष प्रदेश के आधे परिवारों तक तुलसी, गिलोय, अश्वगंधा और कालमेघ के 2-2 सहित कुल 8 औषधीय पौधे पहुंचाए गए हैं। दूसरे वर्ष में प्रदेश के आधे परिवारों तक औषधीय पौधे पहुंचाए जाएंगे। पांच वर्षीय इस योजना के तीसरे साल में सभी परिवारों तक और उसके बाद के 2 वर्षों में आधे-आधे परिवारों तक औषधीय पौधे पहुंचाए जाएंगे। इस तरह से 5 वर्षों में सभी परिवारों को तीन बार 4 प्रजातियों तुलसी, अश्वगंधा, कालमेघ और गिलोय के कुल 24 औषधीय पौधे दिए जाएंगे।

210 करोड रूपए की लागत वाली यह योजना अपनी तरह की देशभर में अनूठी योजना है। मुख्य सचिव की अध्यक्षता में गठित राज्य स्तरीय प्रबोधन समिति द्वारा योजना के सफल क्रियान्वयन के लिये निरंतर बैठकें लेकर अधिकारियों से गंभीर विचार-विमर्श किया गया। इसी तरह योजना के बारे में जन-जन तक जानकारी पहुंचाने और आमजन को औषधीय पौधों के संरक्षण तथा उपयोग के प्रति जागरूक करने के लिए आईईसी कमेटी के प्रयास भी सराहनीय रहे।

योजना के माध्यम से राज्य में औषधीय पौधों को उगाने के इच्छुक परिवारों को स्वास्थ्य रक्षण हेतु बहु-उपयोगी औषधीय पौध वन विभाग की पौधाशालाओं से उपलब्ध करवाए गए। साथ ही लोगो की प्रतिरक्षण (इम्युनिटी) क्षमता बढ़ाने तथा चिकित्सा हेतु बहु-उपयोगी औषधीय पौधों की उपयोगिता के बारे में व्यापक प्रचार-प्रसार किया गया। जिला प्रशासन व वन विभाग के नेतृत्व में, जन-प्रतिनिधि लोगो, पंचायत संस्थाओं, विभिन्न सरकारी विभागों व संस्थानों, विद्यालयों, और उद्योग इत्यादि का सहयोग लेकर जन- अभियान के रूप में योजना का क्रियान्वयन किया गया।

वन विभाग की पौधशालाओं में पौधे तैयार करने के बाद जिला स्तरीय टास्क फोर्स के सहयोग से पौधे आमजन को उपलब्ध करवाए गए। पौध वितरण के समय लाभार्थी के जन आधार कार्ड अथवा आधार कार्ड की जानकारी संधारित की गई ताकि योजना के प्रबोधन और मूल्यांकन में आसानी हो सके। साथ ही औषधीय पौधों के वितरण में पारदर्शिता बनी रहे।

 पूनम खंडेलवाल 

सूचना एवं जनसम्पर्क अधिकारी

Thursday, November 11, 2021

जब ओशो की पुस्तक ने मेरा ढंग तरीका ही बदल दिया

आज भी प्रश्न मौजुद हैं--कौन देगा उत्तर?

सत्तर का दशक था। समय मेरी उम्र रही होगी शायद 15-16 बरस। हाथों में थी ओशो की एक पुस्तक। शायद नाम था भारत के ज्वलंत प्रश्न या जलते प्रश्न। पेपर बैक एडिशन था। भूल गया हूँ की साधना पैकेट बुक्स की प्रकाशन थी या डायमंड वालों की। पिता जी मुंबई से लौटे तो मेरे लिए ओशो की कुछ किताबें लेते आए थे। 

पुस्तक में चुंबकीय आकर्षण था। मैं उसे जल्दी से पढ़ कर समाप्त करना चाहता था। इसलिए घर हो जा बाहर यह पुस्तक मेरे हाथ में ही रहती। इतने में पड़ोस से कोई वृद्ध महिला परिवार से मिलने आई। मेरे हाथ में ओशो की पुस्तक देख कर बोली तू ऐसी किताबें पढ़ता है क्या?मुझे बहुत अजीब सा लगा लेकिन उसी वक्त फैसला कर लिया कि  अब तो  ओशो की पुस्तक हाथ में ही रहा करेगी। तब से अब तक ओशो और मैं निरंतर सम्पर्क में हैं। ओशो के शब्दों के ज़रिए मुलाकात होती रहती है। आने वाले समय में ओशो का प्रभाव अभी और बढ़ेगा। 

आज यह सब याद आया इंटरनेट देखते हुए। वही किताब। टाईटल कुछ नया है। मनसा मोहिनी जी ने बहुत सुंदर ढंग तरीके से अपने ब्लॉग में से इस समग्री को प्रकाशित किया है। ओशो की उस पुस्तक ने देखने, सोचने और समझने तरीका ही बदल दिया था। इन किताबों को पढ़ कर आँख में आँख डाल कर सामने वाले के  एक एक शब्द को सुनना और एक एक शब्द का बारीकी से पोस्टमार्टम करते हुए हर बात का जवाब देना आ गया। 

एक उपलब्धि सी महसूस होती। एक निडरता का अहसास होता। इस तरह ओशो की किताबें जीवन का अंग बनती चली गईं। देखिए उसी पुस्तक में से एक अंश: 

भारत समस्याओं से और प्रश्नों से भरा है। और सबसे बड़ा आश्चर्य तो यह है कि हमारे पास उत्तरों की और समाधानों की कोई कमी नहीं है। शायद जितने प्रश्न हैं हमारे पास, उससे ज्यादा उत्तर हैं और जितनी समस्याएं हैं, उससे ज्यादा समाधान हैं। लेकिन एक भी समस्या का कोई समाधान हमारे पास नहीं है। समाधान बहुत हैं, लेकिन सब समाधान मरे हुए हैं और समस्याएं जिंदा हैं। उनके बीच कोई तालमेल नहीं है। मरे हुए उत्तर हैं और जीवंत प्रश्न हैं। जिंदा प्रश्न हैं और मरे हुए उत्तर हैं।

मरे हुए उत्तर हैं और जीवित प्रश्न हैं। और जैसे मरे हुए आदमी और जिंदा आदमी के बीच कोई बातचीत नहीं हो सकती ऐसे ही हमारे समाधानों और हमारी समस्याओं के बीच कोई बातचीत नहीं हो सकती। एक तरफ समाधानों का ढेर है और एक तरफ समस्याओं का ढेर है। और दोनों के बीच कोई सेतु नहीं है, क्योंकि सेतु हो ही नहीं सकता। मरे हुए उत्तर जिस कौम के पास बहुत हो जाते हैं, उस कौम को नये उत्तर खोजने की कठिनाई हो जाती है।

अब प्रश्नों के साथ एक उलझन है कि प्रश्न सदा नये होते हैं। प्रश्न हमारी फिकर नहीं करते। समस्याएं हमसे पूछ कर नहीं आती हैं, आ जाती हैं। और वे रोज नई हो जाती हैं और हम अपने पुराने समाधानों को जड़ता से पकड़ कर बैठे रह जाते हैं। तब हमें ऐसा लगता है कि समाधान हमारे पास हैं और समस्याएं हल क्यों नहीं होती हैं? गुरु हमारे पास हैं और प्रश्न हल नहीं होते हैं। शास्त्र हमारे पास हैं और जीवन उलझता चला जाता है।

एक बुनियादी भूल, और वह यह है कि सब उत्तर हमारे पुराने हैं। हमने नया उत्तर खोजना बंद कर दिया है। और नये प्रश्न नये उत्तर चाहते हैं। नई समस्याएं नये समाधान मांगती हैं। नई परिस्थितियां नई चेतना को चुनौती देती हैं, लेकिन हम पुराने होने की जिद्द किए बैठे हैं। हम इतने पुराने हो गए हैं और हम पुराने होने के इतने आदी हो गए हैं कि अब हमें खयाल भी नहीं आता कि हम पुराने पड़ गए हैं।

हमारे देश के सामने इसलिए पहला जीता सवाल यह है कि हम मरे हुए उत्तरों को विदा कब करेंगे? उनसे हम छुटकारा कब पाएंगे? उनसे हम कब मुक्त होंगे? क्या कारण है कि हमने नये प्रश्नों के नये उत्तर नहीं खोजे? यही कारण है–अगर हमें खयाल हो कि हमारे पास उत्तर हैं ही रेडीमेड, तैयार, तो हम नये उत्तर क्यों खोजें? मन की तो सहज इच्छा होती है लीस्ट रेसिस्टेंस की; कम से कम तकलीफ उठानी पड़े। उत्तर तैयार हैं तो उसी से काम चला लें। एकबारगी हमारे देश को अपने पुराने उत्तरों से मुक्त और रिक्त हो जाना पड़ेगा तभी हम उस बेचैनी में पड़ेंगे कि हम नई समस्याओं के लिए नये उत्तर खोजें।

हमें अपने अतीत से मुक्त होना पड़ेगा तो ही अपने भविष्य के लिए निर्माण कर सकते हैं। हमें अपने शास्त्रों से मुक्त होना पड़ेगा तो ही हम चिंतन के जगत में प्रवेश कर सकते हैं, अन्यथा हर चीज का तैयार उत्तर हमें किताब में मिल जाता है। मुसीबत आती है, हम गीता खोल लेते हैं। मुसीबत आती है, हम कुरान खोल लेते हैं। मुसीबत आती है, हम मुर्दा गुरुओं के पास पहुंच जाते हैं पूछने कि उत्तर क्या है? हम हमेशा अतीत से पूछते हैं, बीते हुए दिनों से पूछते हैं। लेकिन दुनिया में एक बड़ी क्रांति हो गई है, वह समझ लेनी चाहिए। और अगर वह हम न समझ पाएंगे तो हमारे प्रश्न रोज बढ़ते जायेंगे और हम एक भी प्रश्न को हल न कर सकेंगे। इसी विषय पर आप कुछ और सामग्री पढ़ सकते हैं यहाँ क्लिक कर के ओशो सतसंग में। --रेक्टर कथूरिया 

Tuesday, October 26, 2021

त्यौहार से कहीं बड़ा रिश्ता है--किसी व्रत की कोई गुंजाईश नहीं

 पढ़िए इस लाईफ स्टाईल और अप्रोच को-ज़िंदगी बदल जाएगी  


सोशल मीडिया: 26 अक्टूबर 2021 (रेक्टर कथूरिया//मन के रंग)::

मेरा किसी उपवास, व्रत या त्यौहार से कोई विरोध नहीं है। जो लोग इसके नाम पर आडंबर करते हैं और छुप कर खा पी लेते हैं उनसे भी मैंने कभी विरोध नहीं जताया फिर करवा चौथ तो धर्म कर्म और आस्था से जुड़ा हुआ है। इसके विरोध का सवाल ही पैदा नहीं होता। लेकिन इसी त्यौहार के अवसर पर कुछ ऐसा दिखा कि लगा यही बात असली है। 

मीडिया के पास बहुत सी तस्वीरें जन्मदिन पर छपने आती हैं। बहुत सी तस्वीरें वर्षगांठ पर छपने के लिए आती हैं। यह तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है। तस्वीर है हम सभी के जानेमाने लेखक प्रकाश बादल और और उनकी जीन संगिनी इंदिरा ठाकुर की। उन्होंने 25 अक्टूबर 2021 को सुबह 7:30 बजे पोस्ट की। 

प्रकाश बादल साहिब पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ट सियासतदान प्रकाश बादल के हमनाम हैं। हिमाचल में रहते हैं और जानेमाने फ्रीलांस भी पत्रकार हैं। कभी अजीत समाचार से भी गहरे से जुड़े रहे। वन विभाग में कार्यरत रहने से प्रकृति की सरलता और इसी सरलता में छुपे बहुत से रहस्यों से भी अवगत होते रहे। समय समय पर इन्हें अपनी लेखनी में उजागर करते भी रहते हैं। कलम की धार अक्सर बहुत पैनी भी हो जाया करती है। एक बार पढ़ लो तो याद रहते हैं। इस बार की पोस्ट भी कुछ ऐसी है जो उन्होंने अपनी पत्नी इंदिरा ठाकुर जी के प्रेम में लिखी है। आजकल के युग में शादी के बाद भी यह प्रेम बना रहे यह किसी चमत्कार से कम नहीं। पढ़िए, ध्यान से पढ़िए और आपका ध्यान अपने अंतर्मन में भी चला ही जाएगा। फिर हो सके तो अपने वैवाहिक जीवन पर भी सोचिए। वहां भी कुछ ऐसी झलक मिले तो आप भाग्यशाली हैं। न मिले तो प्रकाश बादल साहिब से गुर सीखने की व्यवस्था अवश्य करें। 


बादल साहिब कहते हैं: करवा चौथ की चकाचौंध हो या उदासियों के सन्नाटे, ऊबड़-खाबड़ रस्ते हों या फूलों भरी क्यारियां, पीड़ा के भंवर हों या खुशियों की उड़ानें। हम हमेशा साथ रहे हैं।  मेरी जिदें रहीं तो इंद्रा के समझौते, मेरा अहंकार रहा तो उसका समर्पण,  मेरी पीड़ा रही तो उसका मरहम , मेरे सपने रहे तो उसके पंख। हमारा साथ कुछ ऐसा है। उसने मुझे बचाने-बनाने के लिये कोई कसर नहीं छोड़ी बल्कि मुझ जैसे नालायक से विवाह करके जीवन बड़े दांव पर लगा दिया। मेरे जीवन पर वो सुरक्षा की एक झिल्ली की तरह चिपकी हुई है, ऐसे में किसी व्रत की कोई गुंजाईश नहीं। उसके दिल में मुहब्बत के रंगों से भरी जो मेरी तस्वीर दिखाई देती है उसके आगे हाथ पर मेंहदी से लिखे बनावटी नाम की आकृति की क्या बिसात। मेंहदी का रंग तो साज-सज्जा का एक क्षणिक ज़रिया है परंतु इंद्रा के भीतर के मुहब्बतों के रंग बड़े चटख हैं। ऐसे में हम किसी व्रत के बंधन में नहीं मुहब्बत के बंधन में जी रहे हैं। हमारे लिए चाँद-चाँद ही है, चाहे करवा चौथ का हो या किसी पूर्णिमा का। हम जीवन की नदी में बहते जा रहे हैं, इंद्रा खुद को मेरे लिए ज़ाया कर रही है तो मैं उसके लिए अंजुरी भर खुशी जुटाने की कवायद में अब तक नाकाम!

पढ़ने के बाद मेरे मुँह से तो अनायास यही निकला:असली बात--असली रंग--असली ज़िंदगी--असली त्यौहार-असली नायक--असली नायका ...प्रकाश बादल और इंदिरा ठाकुर----ज़िंदाबाद ज़िंदाबाद


Friday, August 27, 2021

मन की शक्ति को पहचान पाना इतना कठिन भी नहीं

बस थोड़ा सा अभ्यास और मन बहुत अच्छा मित्र बन जाता है 

चंडीगढ़: 27 अगस्त 2021: (कार्तिका सिंह//मन के रंग)::

मन के रहस्य बहुत गहरे हैं। ध्यान दो तो समझ भी आने लगते हैं और गंभीरता से न लो तो सारी सारी उम्र निकल जाती है लेकिन समझ नहीं आते। अगर गुरुबाणी कहती है मन जीते जग जीत तो बात बहुत सच्ची है। गहरी भी है। अगर मन को जीतना चाहो तो इतना ज़्यादा कठिन भी कुछ नहीं है। एक बार बुल्ले शाह पौदे लगा रहे थे तो किसी रह जाते जज्ञासु मित्र ने सवाल किया भगवान को कैसे पाया जाए? बुल्ले शाह बहुत ही सहजता से हँसते हुए बोले यह कौन सा मुश्किल काम? साथ ही पंजाबी शायरी--बुल्लिया रब दा की पाओणा-एधरों पुट्टणा ते ओधर  लाउणा। अर्थात मन को दुनियादारी से हटा क्र भगवान की तरफ जोड़ लो। बिलकुल इसी तरह जैसे मैं यह पैदा इधर से उखाड़ कर उधर दूसरी जगह लगा देता हूँ। मन को साध लेना इसी सतत कोशिश का नाम है। इसी निरंतर साधना से भी सम्भव है। मन पर निगाह रखो तो मन भी समझने लगता है कि मालिक की नज़र है मुझ पर। इधर उधर नहीं भटकना। 

इसी तरह विवेकानंद भी मन की चर्चा करते हुए मन की कमज़ोरियां भी समझाते  हैं।  बहुत सुंदर शब्दों में और बहुत ही संक्षिप्त शब्दों में विवेकानंद जी कहते हैं:यह समझना बहुत कठिन है, परंतु धीरे धीरे समझ सकोगे कि संसार की कोई भी वस्तु तुम्हारे ऊपर तब तक प्रभाव नहीं डाल सकती, जब तक कि तुम स्वयं ही उसे अपना प्रभाव न डालने दो।  स्वामी विवेकानन्द जी को {वि.सा.- ३ : कर्मयोग: अनासक्ति ही पूर्ण आत्मत्याग है} में अधीन किया जा सकता है। 

अपने निकटम विवेकानंद केंद्र से जुड़िये मन की बातें  होगी और इस शक्ति का आप सदुपयोग कर सकेंगे। 

Tuesday, August 17, 2021

मन किसी एक का होकर नहीं रह सकता--ओशो

 कहीं तो प्रशिक्षण लेना पड़ेगा मन को साधने का 


ओशो मन पर बहुत गहरी चोट करते हैं। शायद यही तरीका है मन की शक्ति से लाभ लेने का। मन पर सिर्फ चोट ही नहीं करते  उसे जागरूक भी बनाते हैं। उसे जगाते भी हैं। उसी के साथ सोई हुई शक्तियां जागती हैं। साथ ही भारतीय संस्कृति और धर्म की उन बातों का मर्म भी समझाते हैं जो हम लकीर के फकीर बन कर  माने तो चले जाते हैं लेकिन  उसकी थाह आज तक नहीं समझ पाए। 

ओशो कहते हैं: *मन वेश्या की तरह है। किसी का नहीं है मन। आज यहां, कल वहां; आज इसका, कल उसका।*

मन की कोई मालकियत नहीं है। और मन की कोई ईमानदारी नहीं है। 

*मन बहुत बेईमान है। वह वेश्या की तरह है। वह किसी एक का होकर नहीं रह सकता।* 

और जब तक तुम एक के न हो सको, तब तक तुम एक को कैसे खोज पाओगे?

*न तो प्रेम में मन एक का हो सकता है; न श्रद्धा में मन एक का हो सकता है—और एक के हुए बिना तुम एक को न पा सकोगे*। 

तो कहीं तो प्रशिक्षण लेना पड़ेगा—एक के होने का।

*इसी कारण पूरब के मुल्कों ने एक पत्नीव्रत को या एक पतिव्रत को बड़ा बहुमूल्य स्थान दिया।* 

उसका कारण है। उसका कारण सांसारिक व्यवस्था नहीं है। उसका कारण एक गहन समझ है। *वह समझ यह है कि अगर कोई व्यक्ति एक ही स्त्री को प्रेम करे, और एक ही स्त्री का हो जाए, तो शिक्षण हो रहा है एक के होने का*। 

*एक स्त्री अगर एक ही पुरुष को प्रेम करे और समग्र—भाव से उसकी हो रहे कि दूसरे का विचार भी न उठे, तो प्रशिक्षण हो रहा है; तो घर मंदिर के लिए शिक्षा दे रहा है; तो गृहस्थी में संन्यास की दीक्षा चल रही है।*

 *अगर कोई व्यक्त्ति एक स्त्री का न हो सके, एक पुरुष का न हो सके, फिर एक गुरु का भी न हो सकेगा; क्योंकि उसका कोई प्रशिक्षण न हुआ।* 

*जो व्यक्ति एक का होने की कला सीख गया है संसार में, वह गुरु के साथ भी एक का हो सकेगा।* 

*और एक गुरु के साथ तुम न जुड़ पाओ तो तुम जुड़ ही न पाओगे*। 

वेश्या किसी से भी तो नहीं जुड़ पाती। और बड़ी, आश्चर्य की बात तो यह है कि *वेश्या इतने पुरुषों को प्रेम करती है, फिर भी प्रेम को कभी नहीं जान पाती*।

अभी एक युवती ने संन्यास लिया। वह आस्ट्रेलिया में वेश्या का काम करती रही। उसने कभी प्रेम नहीं जाना। *यहां आकर वह एक युवक के प्रेम में पड़ गई, और पहली दफा उसने प्रेम जाना। और उसने मुझे आकर कहा कि इस प्रेम ने ही मुझे तृप्त कर दिया; अब मुझे किसी की भी कोई जरूरत नहीं है*। और उसने कहा कि आश्चर्यों का आश्चर्य तो यह है कि मैं तो बहुत पुरुषों के संबंध में रही; लेकिन मुझे प्रेम का कभी अनुभव ही नहीं हुआ।

*प्रेम का अनुभव हो ही नहीं सकता बहुतों के साथ।* 

*बहुतों के साथ केवल ज्यादा से ज्यादा शरीर का भोग, उसका अनुभव हो सकता है।* 

*एक के साथ आत्मा का अनुभव होना शुरू होता है; क्योंकि एक में उस परम एक की झलक है। छोटी झलक है, बहुत छोटी; लेकिन झलक उसी की है*.............

 _*ओशो*_  

 *सुन भई साधो–(प्रवचन–17)*

मन की उलझनें जब सुलझने लगती हैं तो इंसान बिलकुल नया ही बन जाता है। ओशो इस सारी  कैमिस्ट्री को बहुत अच्छी तरह जानते हैं। इसी लिए उनके शब्द पलों में ही सब बदल देते हैं। नेपाली ओशो कहते हैं:


मन के जोड़ का ,

         सारा खेल है ।

मन को तुम शरीर ,

         से जोड़ दो .!

             संसारी हो जाते हो .!!

 और मन को तुम ,

       आत्मा से जोड़ दो ;

            सन्यासी हो जाते हो .!!#ओशो